भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 610, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 610

कृणोत धूमं वृषणं सखायोऽस्रेधन्त इतन वाजमच्छ. अयमग्निः पृतनाषाट् सुवीरो येन देवासो असहन्त दस्यून्.. (९) हे मित्र अध्वर्यु! तुम अरणिमंथन द्वारा कामवर्षक अग्नि को उत्पन्न करो. यदि वह उत्पन्न न हो तो तुम सामर्थ्यवान् बनकर मंथनरूपी युद्ध में लगो. शोभन सामर्थ्य वाले अग्नि सेना के विजेता हैं. इन्हीं की सहायता से देवों ने असुरों को पराजित किया था. (९) अयं ते योनिर्ऋत्वियो यतो जातो अरोचथाः. तं जानन्नग्न आ सीदाथा नो वर्धया गिरः.. (१०) हे अग्नि! ऋतुविशेष में उत्पन्न काष्ठ से निर्मित यह अरणि तुम्हारा उत्पत्ति स्थान है. इससे उत्पन्न होकर तुम शोभा पाते हो. इसे जानते हुए अरणि में बैठो तथा हमारे स्तुति वचनों को बढ़ाओ. (१०) तनूनपादुच्यते गर्भ आसुरो नराशंसो भवति यद्विजायते. मातरिश्वा यदमिमीत मातरि वातस्य सर्गो अभवत्सरीमणि.. (११) अरणियों में गर्भरूप से वर्तमान अग्नि तनूनपात् कहे जाते हैं. उत्पन्न होने पर उनका नाम असुर तथा नराशंस हो जाता है. जब वे आकाश में अपना तेज फैलाते हैं, तब मातरिश्वा कहलाते हैं. अग्नि के शीघ्र गमन पर वायु की उत्पत्ति होती है. (११) सुनिर्मथा निर्मथितः सुनिधा निहितः कविः. अग्ने स्वध्वरा कृणु देवान्देवयते यज.. (१२) हे मेधावी, शोभन मंथन से उत्पन्न एवं उत्तम स्थान में स्थापित अग्नि! हमारे यज्ञ को विघ्नरहित बनाओ एवं देवाभिलाषी यजमान के लिए देवों की पूजा करो. (१२) अजीजनन्नमृतं मर्त्यासोऽस्रेमाणं तरणिं वीळुजम्भम्. दश स्वसारो अग्रुवः समीचीः पुमांसं जातमभि सं रभन्ते.. (१३) मरणधर्मा ऋत्विजों ने अमर, क्षयरहित, दृढ़ दांतों वाले तथा पापोद्धारक अग्नि को जन्म दिया है. जिस प्रकार पुत्र जन्म पर लोग हर्षसूचक शब्द करते हैं, उसी प्रकार दस उंगलियां मिलकर अग्नि की उत्पत्ति पर शब्द करती हैं. (१३) प्र सप्तहोता सनकादरोचत मातुरुपस्थे यदशोचदूधनि. न नि मिषति सुरणो दिवेदिवे यदसुरस्य जठरादजायत.. (१४) सनातन एवं सात होताओं वाले अग्नि विशेष शोभा पाते हैं. जब वे अग्नि धरती माता की गोद एवं उत्तरवेदीरूपी स्तनों पर शोभित होते हैं, तब शोभन शब्द करते हैं. अरणिरूपी काठ के उदर से उत्पन्न होने के कारण वे कभी सोते नहीं हैं. (१४) ebook converter DEMO Watermarks*