भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 612, कुल 1855 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 612

हे इंद्र! तुमने अकेले ही दृढ़मूल राक्षसों को स्थानच्युत किया है एवं पापों को नष्ट करते हुए तुम स्थित हुए हो. तुम्हारी आज्ञा से धरती, आकाश एवं पर्वत निश्चल से रहते हैं. (४) उताभये पुरुहूत श्रवोभिरेको दृळ्हमवदो वृत्रहा सन्. इमे चिदिन्द्र रोदसी अपारे यत्संगृभ्णा मघवन्काशिरित्ते.. (५) हे देवों द्वारा अनेक बार बुलाए गए एवं शक्तिशाली इंद्र! तुमने अकेले ही वृत्र का वध करके जो देवों को अभयदान दिया, वह उचित ही है. हे मघवन्, लोक में तुम्हारी महिमा प्रसिद्ध है कि तुम सीमारहित धरती और आकाश को मिलाते हो. (५) प्र सू त इन्द्र प्रवता हरिभ्यां प्र ते वज्रः प्रमृणन्नेतु शत्रून्. जहि प्रतीचो अनूचः पराचो विश्वं सत्यं कृणुहि विष्टमस्तु.. (६) हे इंद्र! तुम्हारा अश्वयुक्त रथ शत्रुओं की ओर उत्तम मार्ग से चले एवं तुम्हारा वज्र शत्रुओं को मारता हुआ आए. तुम सामने आने वाले, पीछे आने वाले तथा भागने वाले शत्रुओं को मारो. तुम संसार को यज्ञपूर्ण करने की शक्ति दो. (६) यस्मै धायुरदधा मर्त्यायाभक्तं चिद्भजते गेह्यं १ सः. भद्रा त इन्द्र सुमतिर्घृताची सहस्रदाना पुरुहूत रातिः.. (७) हे नित्य ऐश्वर्ययुक्त इंद्र! जिस मनुष्य के लिए तुम शक्ति धारण करते हो, वह पहले अप्राप्त गृहसंबंधी वस्तुओं को प्राप्त करता है. हे पुरुहूत! घृतादि हवि से युक्त तुम्हारी शोभन बुद्धि कल्याणकारी है तथा तुम्हारी धनदान शक्ति असीम है. (७) सहदानुं पुरुहूत क्षियन्तमहस्तमिन्द्र सं पिणक्कुणारुम्. अभि वृत्रं वर्धमानं पियारुमपादमिन्द्र तवसा जघन्थ.. (८) हे पुरुहूत इंद्र! तुम माता दानवी के साथ वर्तमान, बाधक एवं गरजने वाले असुर वृत्र को बिना हाथों का बनाकर चूर्ण कर दो. हे इंद्र! बढ़ते हुए एवं हिंसक वृत्र को पादहीन करके अपनी शक्ति से मार डालो. (८) नि सामनामिशिरामिन्द्र भूमिं महीमपारां सदने ससत्थ. अस्तभ्नाद् द्यां वृषभो अन्तरिक्षमर्षन्त्वापस्त्वयेह प्रसृताः.. (९) हे इंद्र! तुमने महती, सीमारहित एवं चंचल धरती को समतल करके उसके स्थान पर स्थापित किया था. कामवर्षक इंद्र ने धरती और आकाश को इस प्रकार धारण किया है कि वे गिर न सकें. तुम्हारे द्वारा प्रेरित जल धरती पर आए. (९) अलातृणो वल इन्द्र व्रजो गोः पुरा हन्तोर्भयमानो व्यार. सुगान्पथो अकृणोन्निरजे गाः प्रावन्वाणीः पुरुहुतं धमन्तीः.. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*