भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 613, कुल 1855 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 613

हे इंद्र! हिंसक, मध्यमावासी एवं विश्रामस्थल बल नामक मेघ वज्र प्रहार से पहले ही डर कर छिन्नभिन्न हो गया. इंद्र ने जल निकालने के लिए मार्ग सुगम कर दिया था. सुंदर एवं शब्द करता हुआ जल पुरुहूत इंद्र के सम्मुख आया था. (१०) एको द्वे वसुमती समीची इन्द्र आ पप्रौ पृथिवीमुत द्याम्. उतान्तरिक्षादभि नः समीक इषो रथीः सयुजः शूर वाजान्.. (११) इंद्र ने बिना किसी की सहायता के धरती-आकाश को परस्पर मिला हुआ एवं धनसंपन्न बनाया था. हे शूर एवं रथस्वामी इंद्र! हमारे पास रहने की इच्छा से रथ में जुड़े हुए घोड़ों को आकाश से हमारी ओर हांको. (११) दिशः सूर्यो न मिनाति प्रदिष्टा दिवेदिवे हर्यश्वप्रसूताः. सं यदानळध्वन आदिदश्वैर्विमोचनं कृणुते तत्तवस्य.. (१२) इंद्र ने सूर्य के प्रतिदिन के गमन के लिए जो दिशाएं निश्चित की हैं, सूर्य उनका कभी उल्लंघन नहीं करते. सूर्य जब अपना मार्ग समाप्त कर लेते हैं तो घोड़ों को रथ से छोड़ देते हैं, पर यह काम भी इंद्र का ही है. (१२) दिदृक्षन्त उषसो यामन्नक्तोर्विवस्वतया महि चित्रमनीकम्. विश्वे जानन्ति महिना यदागादिन्द्रस्य कर्म सुकृता पुरूणि.. (१३) सब लोग रात बीतने के बाद एवं उषाकाल की समाप्ति पर महान् एवं तेजस्वी सूर्य को देखना चाहते हैं. उषाकाल बीत जाने पर सब लोग अग्निहोत्र आदि को ही कर्म समझते हैं. ये सब उत्तम कर्म इंद्र के ही हैं. (१३) महि ज्योतिर्निहितं वक्षणास्वामा पक्वं चरति बिभ्रती गौः. विश्वं स्वाद्म सम्भृतमुस्रियायां यत्सीमिन्द्रो अधाद्द्रोजनाय.. (१४) इंद्र ने नदियों में महान् एवं तेजस्वी जल भरा है. इंद्र ने नई ब्याई हुई गाय में परम स्वादिष्ट खाद्य पदार्थ रखा है, इसलिए वह दूध धारण करके घूमती है. (१४) इन्द्र दृह्य यामकोशा अभूवन्व्यज्ञाय शिक्ष गृणते सखिभ्यः. दुर्मायवो दुरेवा मर्त्यासो निषङ्गिणो रिपवो हन्त्वासः.. (१५) हे इंद्र! राक्षस मार्ग रोकने वाले हैं, इसलिए तुम दृढ़ बनो व यज्ञ एवं स्तुति करने वाले यजमान तथा उसके पुत्रादि के लिए मनचाहा फल दो. बुरे आयुध फेंकने वाले, धीरेधीरे चलने वाले, हत्यारे एवं तूणीरधारी शत्रुओं को मारो. (१५) सं घोषः शृण्वेऽवमैरमित्रैर्जही न्येष्वशनिं तपिष्ठाम्. वृश्चेमधस्ताद्वि रुजा सहस्व जहि रक्षो मघवन् रन्धयस्व.. (१६) ebook converter DEMO Watermarks*