ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 614, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंहे इंद्र! हम समीपवर्ती शत्रुओं का भयंकर शब्द सुन रहे हैं. तुम अपने संतापकारी वज्र का इन पर प्रयोग करके इन्हें मारो, इन शत्रुओं को जड़ से समाप्त करो, इन्हें विशेष रूप से बाधा पहुंचाओ तथा पराजित करो. हे इंद्र! पहले राक्षसों को मारो. इसके बाद इस यज्ञ को पूरा करो. (१६) उद्वृह रक्षः सहमूलमिन्द्र वृश्चा मध्यं प्रत्यग्रं शृणीहि. आ कीवतः सललूकं चकर्थ ब्रह्मद्विषे तपुषिं हेतिमस्य.. (१७) हे इंद्र! यज्ञ में विघ्न डालने वाले राक्षसों को जड़ से नष्ट करो, उनका बीच का हिस्सा काटो तथा ऊपर का भाग समाप्त करो. चलने वाले राक्षस को दूर फेंक दो. ब्राह्मणों से द्वेष करने वाले उस राक्षस पर संतापकारी अस्त्र फेंको. (१७) स्वस्तये वाजिभिश्च प्रणेतः सं यन्नमहीरिष आसत्सि पूर्वीः. रायो वन्तारो बृहतः स्यामस्मे अस्तु भग इन्द्र प्रजावान्.. (१८) हे विश्वपालक इंद्र! हमें घोड़ों का मालिक एवं अविनाशी बनाओ. यदि तुम हमारे समीप रहोगे तो हम बहुत से अन्न एवं विशाल धन का उपभोग करते हुए महान् बनेंगे. हे इंद्र! हमारे पास संतानयुक्त धन दो. (१८) आ नो भर भगमिन्द्र द्युमन्तं नि ते देष्णस्य धीमहि प्ररेके. ऊर्ध्वव पप्रथे कामो अस्मे तमा पृण वसुपते वसूनाम्.. (१९) हे इंद्र दीप्तियुक्त धन हमारे पास लाओ. हम तुझ दानशील के धन के पात्र हैं. हे धनपति! हमारी अभिलाषा बड़वानल के समान बढ़ गई है, तुम उसे पूर्ण करो. (१९) इमं कामं मन्दया गोभिरश्वैश्चन्द्रवता राधसा पप्रथञ्च. स्वर्यवो मतिभिस्तुभ्यं विप्रा इन्द्राय वाहः कुशिकासो अक्रन्.. (२०) हे इंद्र! हमारी इस धनाभिलाषा को गायों, घोड़ों एवं दीप्तियुक्त धन से पूरा करो. इन संपत्तियों द्वारा हमें प्रसिद्ध बनाओ. स्वर्गादि सुख के अभिलाषी एवं यज्ञकर्म में कुशल कुशिकगोत्रीय ऋषियों ने मंत्रों द्वारा यह स्तुति की है. (२०) आ नो गोत्रा दर्दृहि गोपते गाः समस्मभ्यं सनयो यन्तु वाजाः. दिवक्षा असि वृषभ सत्यशुष्मोऽस्मभ्यं सु मघवन्बोधि गोदाः.. (२१) हे स्वर्ग के स्वामी इंद्र! बादलों को फाड़ कर हमें जल दो. इसके बाद उपभोग के योग्य अन्न हमारे पास आए. हे कामवर्षक! तुम आकाश को व्याप्त किए हो. हे सत्य सामर्थ्य मघवन्! हमें गाएं दो. (२१) शुनं हुवेम मघवानमिन्द्रमस्मिन्भरे नृतमं वाजसातौ. ebook converter DEMO Watermarks*