ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 628, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंयाँ आभजो मरुत इन्द्र सोमे ये त्वामवर्धन्नभवन्नगणस्ते. तेभिरेतं सजोषा वावशानोऽग्नेः पिब जिह्वया सोममिन्द्र.. (९) हे इंद्र! सोमपान के समय तुम जिन मरुतों का आदर करते हो, युद्ध में जो मरुद्गण तुम्हें बढ़ाते एवं तुम्हारी सहायता करते हैं, उन्हीं मरुतों के साथ मिलकर सोमपान की अभिलाषा करने वाले तुम अग्निरूपी जीभ द्वारा सोम पिओ. (९) इन्द्र पिब स्वधया चित्सुतस्याग्नेर्वा पाहि जिह्वया यजत्र. अध्वर्योर्वा प्रयतं शक्र हस्ताद्धोतुर्वा यज्ञं हविषो जुषस्व.. (१०) हे यज्ञ के योग्य इंद्र! स्वधा अग्निरूपी जीभ द्वारा निचोड़े हुए सोम को पिओ. हे शुक्र! अध्वर्यु के हाथ से दिया हुआ सोम पिओ अथवा होता के द्वारा दिए गए हव्य का सेवन करो. (१०) शुनं हुवेम मघवानमिन्द्रमस्मिन्भरे नृतमं वाजसातौ. शृण्वन्तमुग्रमूतये समत्सु घ्नन्तं वृत्राणि सञ्जितं धनानाम्.. (११) धन प्राप्ति वाले संग्राम में उत्साहपूर्ण, धनवान्, सकल विश्व के नेता, स्तुतियां सुनने वाले, शत्रुओं के लिए भयंकर, युद्ध में राक्षस विनाशकारी एवं शत्रुओं के धन के विजेता इंद्र को हम रक्षा के लिए बुलाते हैं. (११) सूक्त—३६ देवता—इंद्र इमाम् षु प्रभृतिं सातये धाः शश्वच्छश्वदूतिभिर्यादमानः. सुतेसुते वावृधे वर्धनेभिर्यः कर्मभिर्महद्भिः सुश्रुतो भूत्.. (१) हे इंद्र! मरुतों के साथ सदा सर्वदा संगति की याचना करते हुए हमारे धनलाभ के लिए आकर इस सोम को सफल बनाओ. अपने महान् कर्मों के कारण प्रसिद्ध इंद्र सोम निचोड़ने के प्रत्येक अवसर पर वृद्धिकारक हव्यों द्वारा बढ़े हैं. (१) इन्द्राय सोमाः प्रदिवो विदाना ऋभुर्येभिर्वृषपर्वा विहायाः. प्रयम्यमानान्प्रति षू गृभायेन्द्र पिब वृषधूतस्य वृष्णः.. (२) प्राचीनकाल में इंद्र के लिए सोमरस दिया गया था. उसके कारण वह समान रूप, तेजस्वी एवं महान् हुए थे. वे इंद्र! इस दिए हुए सोम को ग्रहण करो एवं पत्थरों द्वारा निचोड़े गए तथा स्वर्गादि फल देने वाले सोम को पिओ. (२) पिबा वर्धस्व तव घा सुतास इन्द्र सोमासः प्रथमा उतेमे. यथापिबः पूर्वां इन्द्र सोमाँ एवा पाहि पन्यो अद्या नवीयान्.. (३) ebook converter DEMO Watermarks*