ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 640, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूक्त—४४ देवता—इंद्र अयं ते अस्तु हर्यतः सोम आ हरिभिः सुतः. जुषाण इन्द्र हरिभिर्न आ गह्या तिष्ठ हरितं रथम्.. (१) हे इंद्र! पत्थरों द्वारा निचोड़ा गया, सुंदर एवं प्रसन्नता का विषय यह सोम तुम्हारे लिए हो. तुम अपने हरे रंग के रथ पर बैठो एवं हरि नामक घोड़ों की सहायता से हमारे सामने आओ. (१) हर्यन्नुषसमर्चयः सूर्यं हर्यन्नरोचयः. विद्वांश्चिकित्वान्हर्यश्व वर्धस इन्द्र विश्वा अभि श्रियः.. (२) हे इंद्र! तुम सोम के अभिलाषी बनकर उषा की पूजा करते एवं सूर्य को प्रकाशित करते हो. हे हरि नामक घोड़ों वाले, विद्वान् एवं हमारी अभिलाषा को जानने वाले इंद्र! तुम हमारी सभी संपत्तियों को बढ़ाते हो. (२) द्यामिन्द्रो हरिधायसं पृथिवीं हरिवर्पसम्. अधारयद्धरितोर्भूरि भोजनं ययोरन्तर्हरिश्चरत्.. (३) इंद्र ने हरे रंग की किरणों वाले स्वर्गलोक तथा ओषधियों के कारण हरे रंग की धरती को धारण किया था. द्यावापृथ्वी इंद्र के हरि नामक घोड़ों को पर्याप्त भोजन देते हैं एवं इंद्र इन्हीं के मध्य विचरण करते हैं. (३) जज्ञानो हरितो वृषा विश्वमा भाति रोचनम्. हर्यश्वो हरितं धत्त आयुधमा वज्रं बाह्वोर्हरिम्.. (४) हरे वर्ण वाले एवं कामवर्षी इंद्र जन्म लेते ही सारे संसार को प्रकाशित कर देते हैं. हरि नामक घोड़ों के स्वामी इंद्र हाथों में हरे रंग का आयुध एवं शत्रुओं के प्राण हरण करने वाला वज्र रखते हैं. (४) इन्द्रो हर्यन्तमर्जुनं वज्रं शुक्रैरभीवृतम्. अपावृणोद्धरिभिरद्रिभिः सुतमुद्गा हरिभिराजत्.. (५) इंद्र ने कमनीय, श्वेत वर्ण, दूध मिले हुए, वेगवान् एवं पत्थरों द्वारा निचोड़े गए सोम को आवरणरहित किया है एवं घोड़ों के साथ मिलकर पणियों द्वारा चुराई गई गाएं गुफा से बाहर निकाली हैं. (५) सूक्त—४५ देवता—इंद्र ebook converter DEMO Watermarks*