ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 652, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंहे पुत्रो! मैं विश्वामित्र धरती और आकाश द्वारा इंद्र की स्तुति कराता हूं. यह स्तोत्र भरतवंशीय लोगों की रक्षा करे. (१२) विश्वामित्रा अरासत ब्रह्मेन्द्राय वज्रिणे. करदिन्नः सुराधसः.. (१३) हम विश्वामित्र के पुत्रों ने वज्रधारी इंद्र का स्तोत्र किया. इंद्र हमें शोभन धन वाला करें. (१३) किं ते कृण्वन्ति कीकटेषु गावो नाशीरं दुहे न तपन्ति घर्मम्. आ नो भर प्रमगन्दस्य वेदो नैचाशाखं मघवन्धया नः.. (१४) हे इंद्र! अनार्य लोगों के जनपदों में गाएं तुम्हारे लिए कुछ भी नहीं करेंगी. न वे सोमरस में मिलाने के लिए दूध देती हैं और न यज्ञपात्र को अपने दूध से दीप्त कर सकती हैं. हे मघवा! वे गाएं हमारे पास ले आओ और प्रमगंद का धन भी हमें दो. तुम नीच वंश वाले लोगों का धन हमें प्रदान करो. (१४) ससर्परीरमतिं बाधमाना बृहन्मिमाय जमदग्निदत्ता. आ सूर्यस्य दुहिता ततान श्रवो देवेष्वमृतमजुर्यम्.. (१५) अग्नि प्रज्वलित करने वाले ऋषियों द्वारा हमें दी गई, अज्ञान को रोकने वाली एवं शब्द के रूप में सब जगह फैलने वाली वाणी बृहद् रूप धारण करती है. सूर्य की पुत्री वाणी-देवता इंद्र आदि देवों के समीप क्षयरहित एवं अमृतरूप अन्न का विचार करती है. (१५) ससर्परीरभरत्तूयमेभ्योऽधि श्रवः पाञ्चजन्यासु कृष्टिषु. सा पक्ष्या३ नव्यमायुर्दधाना यां मे पलस्तिजमदग्नयो ददुः.. (१६) ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र एवं निषादों के धन से अधिक धन गद्यपद्य रूप में विस्तृत वाग्देवता हमें शीघ्र प्रदान करें. दीर्घायु वाले जमदग्नि आदि ऋषियों ने जो वाणी मुझे दी, वह सूर्यरूपी वाणी मुझे नवीन अन्न वाला बनावे. (१६) स्थिरौ गावौ भवतां वीळुरक्षो मेषा वि वर्हि मा युगं वि शारि. इन्द्रः पातले ददतां शरीतोररिष्टनेमे अभि नः सचस्व.. (१७) गतिशील अश्व स्थिर हो. रथ का धुरा दृढ़ हो. दंड एवं जुआ न टूटे. गिरने वाली कीलों को टूटने से पहले ही इंद्र धारण करें. हे नष्ट न होने वाले नेमियुक्त रथ! हमारे सामने आओ. (१७) बलं धेहि तनूषु नो बलमिन्द्रानळुत्सु नः. बलं तोकाय तनयाय जीवसे त्वं हि बलदा असि.. (१८) ebook converter DEMO Watermarks*