भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 662, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 662

मायावी असुर एवं विद्वान् इंद्र आदि देवों के प्रथम स्थिर एवं प्रसिद्ध कर्मों में बाधा नहीं डालते. द्वेष-भाव से हीन धरती-आकाश प्रजाओं के साथ देवों के लिए विघ्नकारक नहीं बनते. धरती पर ऊंचे खड़े पर्वतों को कोई झुका नहीं सकता. (१) षड्भाराँ एको अचरन्बिभर्त्यृतं वर्षिष्ठमुप गाव आगुः. तिस्रो महीरुपरास्तस्थुरत्या गुहा द्वे निहिते दर्शैका.. (२) एक स्थिर वर्ष छः ऋतुओं को धारण करता है. सत्य एवं अतिशय वृद्ध सूर्यरूप संवत्सर को किरणें प्राप्त करती हैं. उत्पन्न और नष्ट होने वाले तीनों लोक एक-दूसरे के ऊपर स्थित हैं. उन में ही स्वर्ग और अंतरिक्ष गुहा में छिपे हैं. एकमात्र धरती ही दिखाई देती है. (२) त्रिपाजस्यो वृषभो विश्वरूप उत त्र्युधा पुरुध प्रजावान्. त्र्यनीकः पत्यते महिनावान्त्स रेतोधा वृषभः शश्वतीनाम्.. (३) ग्रीष्म, वर्षा एवं हेमंत-तीन ऋतुएं संवत्सर का हृदय हैं एवं वसंत, शरद् एवं हेमंत तीन ऋतुएं स्तन हैं. जल बरसाने वाला, विविध रूपधारी, जौ, गेहूं आदि अनेक प्रकार की प्रजाओं से युक्त, ग्रीष्म, वर्षा तथा शीत तीन गुणों सहित एवं महत्त्वशाली संवत्सर आता है. वह वीर्य धारण में समर्थ है एवं सबके लिए जल लाता है. (३) अभीक आसां पदवीरबोध्यादित्यानामह्वे चारु नाम. आपश्चिदस्मा अरमन्त देवीः पृथग्व्रजन्तीः परि षीमवृञ्जन्.. (४) संवत्सर ओषधियों के समीप रहकर फल-पुष्पादि उत्पादन के लिए सावधान रहते हैं. मैं आदित्यों का चैत्र आदि मनोहर नाम बोलता हूं. द्योतमान एवं अलग-अलग बहने वाले जल चार मास तक संवत्सर को प्रसन्न करते हैं एवं शेष आठ मासों में छोड़ देते हैं. (४) त्री षधस्था सिन्धवस्त्रिः कवीनामुत त्रिमाता विदथेषु सम्राट्. ऋतावरीर्योषणास्तिस्रो अप्यास्त्रिरा दिवो विदथे पत्यमानाः.. (५) हे नदियो! तीन गुण वाले तीन लोक देवों के निवासस्थान हैं. तीनों लोकों के बनाने वाले सूर्य यज्ञों के राजा हैं. जलपूर्ण एवं आकाश में गमन करने वाली इला, सरस्वती एवं भारती परस्पर मिली हुई देवियां यज्ञ के तीनों सवनों में आवें. (५) त्रिरा दिवः सवितर्वार्याणि दिवेदिवे आ सुव त्रिर्नो अह्नः. त्रिधातु राय आ सुवा वसूनि भग त्राताधिषणे सातये धाः.. (६) हे आदित्य! स्वर्गलोक से प्रतिदिन तीन बार आकर हम लोगों को धन दो. हे सबके द्वारा सेवा योग्य एवं सबके रक्षक आदित्य! हमें पशु, कनक एवं रत्न रूप तीन प्रकार का धन दो. हे वाग्देवी! हमें धनलाभ के लिए प्रेरित करो. (६) ebook converter DEMO Watermarks*