भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

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पृष्ठ 663

त्रिरा दिवः सविता सोषवीति राजाना मित्रावरुणा सुपाणी. आपश्चिदस्य रोदसी चिदुर्वी रत्नं भिक्षन्त सवितुः सवाय.. (७) सविता दिन में तीन बार हमें धन दें. दीप्तिमान् एवं शोभन हाथों वाले हम विस्तृत धरती-आकाश, मित्र-वरुण, अंतरिक्ष एवं सविता देव की प्रेरणा से मनचाहा अर्थ चाहते हैं. (७) त्रिरुत्तमा दूणशा रोचनानि त्रयो राजन्त्यसुरस्य वीराः. ऋतावान इषिरा दूळभासस्त्रिरा दिवो विदथे सन्तु देवाः.. (८) द्युतिमान तीन उत्तम स्थान हैं, जिन्हें कोई नष्ट नहीं कर सकता. इन तीनों स्थानों में संवत्सर के अग्नि, वायु एवं सूर्य तीन पुत्र सुशोभित होते हैं. यज्ञादि कर्मों से युक्त, शीघ्र गति वाले एवं अतिरस्करणीय देवगण हमारे यज्ञ के तीनों सवनों में आवें. (८) सूक्त—५७ देवता—विश्वेदेव प्र मे विविक्वाँ अविदन्मनीषां धेनुं चरन्तीं प्रयुतामगोपाम्. सद्यश्चिद्या दुदुहे भूरि धासेरिन्द्रस्तदग्निः पनितारो अस्याः.. (१) ज्ञानवान् इंद्र इधर-उधर जाती हुई, अकेली इच्छानुसार घूमती हुई गाय के समान मेरी देव-संबंधी स्तुति को जानें. इंद्र और अग्नि इस स्तुतिरूपी गाय की प्रशंसा करें, जिससे तुरंत ही अधिक अभिलषित फल दुहा जाता है. (१) इन्द्रः सु पूषा वृषणा सुहस्ता दिवो न प्रीताः शशयं दुदुह्रे. विश्वे यदस्यां रणयन्त देवाः प्र वोऽत्र वसवः सुम्नमश्याम्.. (२) इंद्र! पूषा, कामवर्षी एवं शोभन हाथों वाले अश्विनीकुमार प्रसन्न होकर आकाश में सोने वाले मेघ से मनचाही वृष्टि प्राप्त करते हैं. हे निवासस्थान देने वाले विश्वेदेव! इस वेदी पर रमण करो, जिससे हम तुम्हारे द्वारा दिया हुआ सुख पा सकें. (२) या जामयो वृष्ण इच्छन्ति शक्तिं नमस्यन्तीर्जानते गर्भमस्मिन्. अच्छा पुत्रं धेनवो वावशाना महश्चरन्ति बिभ्रतं वपूंषि.. (३) जो ओषधियां जल बरसाने वाले इंद्र की शक्ति को चाहती हैं, वे नम्र होकर इंद्र की गर्भाधान की शक्ति जानती हैं. फल की कामना करने वाली एवं सबको प्रसन्न करने वाली ओषधियां भांति-भांति के रूप धारण करने वाले जौ, गेहूं आदि पुत्रों के समान घूमती हैं. (३) अच्छा विवक्मि रोदसी सुमेके ग्राव्णो युजानो अध्वरे मनीषा. इमा उ ते मनवे भूरिवारा ऊर्ध्वा भवन्ति दर्शता यजत्राः.. (४) ebook converter DEMO Watermarks*