भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 664, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 664

यज्ञ में सोमरस निचोड़ने के लिए पत्थर लेकर हम शोभन रूप वाले धरती-आकाश के सामने होकर स्तुति रूप वाणी से प्रशंसा करते हैं. अग्नि को वरण करने योग्य, दर्शनीय एवं पूज्य दीप्तियां मनुष्यों के व्यवहार के लिए ऊपर मुख करती हैं. (४) या ते जिह्वा मधुमती सुमेधा अग्ने देवेषूच्यत उरूची. तयेह विश्वाँ अवसे यजत्राना सादय पायया चा मधूनि.. (५) हे अग्नि! तुम्हारी जो ज्वाला-रूपिणी जीभ जलपूर्ण एवं बुद्धियुक्त है एवं देवों को बुलाने के लिए प्रेरणा देती है, उसी जिह्वा से यज्ञ के योग्य समस्त देवों को हमारी रक्षा के निमित्त इस यज्ञ में बैठाओ एवं मादक सोम पिलाओ. (५) या ते अग्ने पर्वतस्येव धारास्रवन्ती पीपयद्देव चित्रा. तामस्मभ्यं प्रमतिं जातवेदो वसो रास्व सुमतिं विश्वजन्याम्.. (६) हे अग्नि देव! विविध रूपधारिणी एवं हमें त्यागकर अन्यत्र न जाने वाली तुम्हारी उत्तम- बुद्धि हम लोगों को उसी प्रकार बढ़ाए, जिस प्रकार बादलों से उत्पन्न जलधारा वनस्पतियों को बढ़ाती है. हे निवासदाता एवं जातवेद अग्नि! हमें वही परहितसमर्थ एवं सर्वजनहितकारिणी बुद्धि दो. (६) सूक्त—५८ देवता—अश्विनीकुमार धेनुः प्रत्नस्य काम्यं दुहानान्तः पुत्रश्चरति दक्षिणायाः. आ द्योतनिं वहति शुभ्रयामोषाः स्तोमो अश्विनावजीगः.. (१) प्रसन्न करने वाली उषा पुरातन-अग्नि के निमित्त सुंदर दूध देती है. उषा का पुत्र सूर्य उषा के भीतर विचरण करता है. उज्ज्वल गति वाला दिवस सर्वप्रकाशक सूर्य को धारण करता है. उषा से पहले ही अश्विनीकुमारों की स्तुति करने वाले जागते हैं. (१) सुयुग्वहन्ति प्रति वामृतेनोर्ध्वा भवन्ति पितरेव मेधाः. जरेथामस्मद्दि पणेर्मनीषां युवोरवश्वकृमा यातमर्वाक्.. (२) हे अश्विनीकुमारो! रथ में भली प्रकार जुड़े हुए घोड़े सत्यरूपी रथ के द्वारा यज्ञ में आने के लिए तुम्हें वहन करते हैं. पुत्र जिस प्रकार माता-पिता को देखकर जाता है, उसी प्रकार यज्ञ तुम्हारे सामने जाते हैं. आसुरी बुद्धि को हमसे बहुत दूर करो. हम तुम्हारे लिए हव्य तैयार करते हैं. तुम हमारे सामने आओ. (२) सुयुग्भिरश्वैः सुवृता रथेन दस्राविमं शृणुतं श्लोकमद्रेः. किमङ्ग वां प्रत्यवर्तिं गमिष्ठाहुर्विप्रासो अश्विना पुराजाः.. (३) ebook converter DEMO Watermarks*

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