भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 712, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 712

इंद्र जिस प्रकार अपनी शत्रुनाशक सेना को पूर्ण करते हैं, उसी प्रकार इन्होंने किनारों को तोड़ने वाली, जल से भरी हुई एवं अन्न पैदा करने में सहायक नदियों को पूर्ण किया था एवं प्यासे लोगों की प्यास बुझाई थी, इंद्र ने ऐसी गायों का दूध काढ़ा, जिन पर राक्षसों ने अधिकार कर लिया था तथा जो बछड़ा पैदा कर चुकी थीं. (७) पूर्वीरुषसः शरदश्च गूर्ता वृत्रं जघन्वाँ असृजद्वि सिन्धून्. परिष्ठिता अतृणद्बद्धधानाः सीरा इन्द्रः सवितवे पृथिव्या.. (८) इंद्र ने वृत्र राक्षस को मारकर अंधकार द्वारा लिपटी हुई अनेक उषाओं एवं संवत्सरों को उसके बंधन से छुड़ाया था. इसके साथ ही वृत्र द्वारा रोके हुए जल को प्रवाहित किया था. इंद्र ने मेघ के चारों ओर स्थित एवं वृत्र राक्षस द्वारा रोकी गई नदियों को धरती के ऊपर बहने योग्य बनाया. (८) वम्रीभिः पुत्रमग्रुवो अदानं निवेशनाद्धरिव आ जभर्थ. व्य१ न्धो अख्यदहिमाददानो निर्भूदुखच्छित्समरन्त पर्व.. (९) हे हरि नामक घोड़ों के स्वामी इंद्र! तुमने उपजिह्विका नामक विशेष कीड़ों द्वारा खाए हुए अग्रपुत्र को वल्मीक से बाहर निकाला था. अंधे अग्रपुत्र ने सांप के समान भली प्रकार देखा, क्योंकि उसके उपजिह्विका द्वारा खाए हुए अंगों को इंद्र ने पूर्ववत् कर दिया था. (९) प्र ते पूर्वाणि करणानि विप्राविद्वाँ आह विदुषे करांसि. यथायथा वृष्ण्यानि स्वगूर्तापांसि राजन्र्य्याविवेषीः.. (१०) हे बुद्धिमान् राजन् एवं सब कुछ जानने वाले इंद्र! तुमने जिस प्रकार वर्षण कार्य किए एवं मनुष्यों को संपन्न करने वाली वर्षा करने में संपर्क कार्य किए, वामदेव ने उनका ज्यों का त्यों वर्णन कर दिया है. (१०) नू ष्टुत इन्द्र नू गृणान इषं जरित्रे नद्यो३ पीपेः. अकारि ते हरिवो ब्रह्म नव्यं धिया स्याम रथ्यः सदासाः.. (११) हे इंद्र! जिस प्रकार जल नदी को पूर्ण करता है, उसी प्रकार तुम पूर्ववर्ती ऋषियों की तथा हमारी स्तुतियां स्वीकार करके हमारी अन्न वृद्धि करो. हे हरि नामक घोड़ों के स्वामी इंद्र! हमने तुम्हारे निमित्त नई स्तुतियां बनाई हैं. हम रथ के स्वामी एवं तुम्हारे सेवक बनें. (११) सूक्त—२० देवता—इंद्र आ न इन्द्रो दूरादा न आसादभिष्टिकृदवसे यासदुग्रः. ओजिष्ठेभिर्नृपतिर्वज्रबाहुः सङ्गे समत्सु तुर्वणिः पृतन्यून्.. (१) eBook converter DEMO Watermarks*