भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 713, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 713

अभिलाषाएं पूर्ण करने वाले, शक्तिशाली, युद्धस्थल में शत्रुओं का नाश करने वाले, हाथ में वज्र धारणकर्त्ता, प्रजाओं के पालक एवं तेजस्वी मरुतों से घिरे हुए इंद्र हमें आश्रय देने के लिए पास अथवा दूर से आवें. (१) आ न इन्द्रो हरिभिर्यात्वच्छार्वाचीनोऽवसे राधसे च. तिष्ठाति वज्री मघवा विरप्शीमं यज्ञमनु नो वाजसातौ.. (२) इंद्र हमारी रक्षा करने एवं धन प्रदान करने के लिए हरि नामक घोड़ों की सहायता से हमारे सामने आवें. वज्रधारी, धन के स्वामी एवं महान् इंद्र युद्ध में उपस्थित होने के बाद हमारे इस यज्ञ में आवें. (२) इमं यज्ञं त्वमस्माकमिन्द्र पुरो दधत्सनिष्यसि क्रतुं न:. श्वघ्नीव वज्रिन्तसनये धनानां त्वया वयमर्य आजिज्जयेम.. (३) हे इंद्र! हमारे इस यज्ञ में सामने उपस्थित होकर तुम इसे पूर्ण करो. हे वज्रधारी इंद्र! शिकारी जिस प्रकार हिरणों का शिकार करता है, उसी प्रकार हम भी धन पाने के लिए तुम्हारी शक्ति के द्वारा संग्राम में विजय प्राप्त करें. (३) उशन्नु षु ण: सुमना उपाके सोमस्य नु सुषुतस्य स्वधाव:. पा इन्द्र प्रतिभृतस्य मध्व: समन्धसा ममद: पृष्ठचेन.. (४) हे अन्न के स्वामी इंद्र! तुम प्रसन्न मन से हमारे पास आओ एवं हमारी कामना करते हुए भली प्रकार निचोड़े गए नशीले सोमरस को पिओ. तुम माध्यंदिन सवन में बोली जाती हुई स्तुतियां सुनते हुए सोमरस पिओ एवं प्रसन्न बनो. (४) वि यो ररप्श ऋषिभिर्नवेभिर्वृक्षो न पक्व: सृण्यो न जेता. मर्यो न योषामभिमन्यमानोऽच्छा विवक्मि पुरुहूतमिन्द्रम्.. (५) पके हुए फलों वाले वृक्ष एवं आयुधसंचालन में कुशल युद्ध विजेता वीर के समान, नए ऋषियों द्वारा अनेक प्रकार से स्तुत एवं बहुत से यजमानों द्वारा बुलाए गए इंद्र की हम उसी प्रकार प्रशंसा करते हैं, जैसे कामी पुरुष सुंदर नारी की प्रशंसा करता है. (५) गिरिर्न य: स्वतवाँ ऋष्व इन्द्र: सनादेव सहसे जात उग्र:. आदर्ता वज्रं स्थविरं न भीम उद्नेव कोशं वसुना न्युष्टम्.. (६) पर्वत के समान विशाल, तेजस्वी, शत्रुओं को पराजित करने वाले एवं प्राचीन काल में उत्पन्न इंद्र पानी से भरे हुए पात्र के समान पूर्ण ओजस्वी एवं वज्र को धारण करने वाले हैं. (६) न यस्य वर्ता जनुषा न्वस्ति न राधस आमरीता मघस्य. ebook converter DEMO Watermarks*