भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 714, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 714

उद्वावृषाणस्तविषीव उग्रास्मभ्यं दद्धि पुरुहूत रायः.. (७) हे इंद्र! जब से तुम उत्पन्न हुए हो, तभी से न तो कोई तुम्हें रोकने वाला है और न तुम्हारे द्वारा यज्ञों के निमित्त दिए हुए धन को कोई नष्ट कर सकता है. हे कामवर्षी, शक्तिशाली, तेजस्वी एवं बहुत से यजमानों द्वारा बुलाए गए इंद्र! हमें धन दो. (७) ईक्षे रायः क्षयस्य चर्षणीनामृत व्रजमपवर्तासि गोनाम्. शिक्षानरः समिथेषु प्रहावान्वस्वो राशिमभिनेतासि भूरिम्.. (८) हे इंद्र! तुम लोगों की संपत्ति एवं घरों को देखने के अतिरिक्त राक्षसों द्वारा रोकी हुई गायों को छुड़ाते हो. हे इंद्र! तुम नेता के समान प्रजाओं का शासन करते हो एवं युद्ध में प्रहारकर्त्ता हो. हमें विपुल धनराशि दो. (८) कया तच्छृण्वे शच्या शचिष्ठो यया कृणोति मुहु का चिदृष्वः. पुरु दाशुषे विचयिष्ठो अंहोऽथा दधाति द्रविणं जरित्रे.. (९) अतिशय बुद्धिमान् इंद्र किस प्रजा-शक्ति से युक्त हैं? महान् इंद्र अपने बुद्धिबल से ही बड़े-बड़े कामों को पूरा करते हैं. वे यजमानों के बड़े-बड़े पापों को नष्ट करने के साथ-साथ स्तुतिकर्त्ताओं को धन देते हैं. (९) मा नो मर्धीरा भरा दद्धि तन्नः प्र दाशुषे दातवे भूरि यत्ते. नव्ये देष्णे शस्ते अस्मिन्त उक्थे प्र ब्रवाम वयमिन्द्र स्तुवन्तः.. (१०) हे इंद्र! हमारी हिंसा मत करो, हमारा पोषण करो. जो विपुल धनराशि हव्यदाता को देने के लिए है, वह हमें दो, क्योंकि हम तुम्हारी स्तुति करते हैं. इस दानयोग्य एवं प्रशंसनीय यज्ञ में हम तुम्हारी भली प्रकार स्तुति करेंगे. (१०) नू ष्टुत इन्द्र नू गृणान इषं जरित्रे नद्यो३ न पीपेः. अकारि ते हरिवो ब्रह्म नव्यं धिया स्याम रथ्यः सदासाः.. (११) हे इंद्र! जिस प्रकार जल सरिता को पूर्ण करता है, उसी प्रकार तुम पूर्ववर्ती ऋषियों की तथा हमारी स्तुतियां सुनकर उन्हें स्वीकार करो एवं हमारा अन्न बढ़ाओ. हे हरि नामक घोड़ों के स्वामी इंद्र! हमने तुम्हारे निमित्त नवीन स्तुतियां बनाईं हैं. हम रथ के स्वामी एवं तुम्हारे सेवक बनें. (११) सूक्त—२१ देवता—इंद्र आ यात्विन्द्रोऽवस उप न इह स्तुतः सधमादस्तु शूरः. वावृधानस्तविषीर्यस्य पूर्वीद्यौर्न क्षत्रमभिभूति पुष्यात्.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*