भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 718, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 718

अत्राह ते हरिवस्ता उ देवीरवोभिरिन्द्र स्तवन्त स्वसारः. यत्सीमन्व प्र मुचो बद्वधाना दीर्घामनु प्रसितिं स्यन्दयध्यै.. (७) हे हरि नामक घोड़ों के स्वामी इंद्र! तुमने जब वृत्र राक्षस द्वारा रोकी हुई नदियों को दीर्घकालिक बंधन के पश्चात् इच्छानुसार बहने के लिए स्वतंत्र किया था, तभी उन दिव्य सरिताओं ने तुम्हारे द्वारा होने वाली रक्षा के कारण तुम्हारी स्तुति की थी. (७) पिपीळे अंशुर्मद्यो न सिन्धुरा त्वा शमी शशमानस्य शक्तिः. अस्मद्र्यक्शुशुचानस्य यम्या आशुनं रश्मिं तुव्योजसं गोः.. (८) मदकारक निचोड़ा हुआ सोमरस तुम्हारे समीप पहुंचे. तेज चलने वाला सवार जिस प्रकार घोड़े की लगाम पकड़कर उसे आगे बढ़ाता है, उसी प्रकार तुम भी तेजस्वी स्तोता की स्तुतियों को हमारे पास आने के लिए प्रेरित करो. (८) अस्मे वर्षिष्ठा कृणुहि ज्येष्ठा नृम्णानि सत्रा सहुरे सहांसि. अस्मभ्यं वृत्रा सुहनानि रन्धि जहि वधर्वनुषो मर्तस्य.. (९) हे सहनशील इंद्र! तुम शत्रुओं को हराने वाला, श्रेष्ठ एवं उन्नत बल हमें सदा प्रदान करो, मारने योग्य शत्रुओं को हमारे वश में लाओ एवं हिंसक लोगों के आयुधों का नाश करो. (९) अस्माकमित्सु शृणुहि त्वमिन्द्रास्मभ्यं चित्राँ उप माहि वाजान्. अस्मभ्यं विश्वा इषणः पुरन्धीरस्माकं सु मघवन्बोधि गोदाः.. (१०) हे इंद्र! तुम हमारी स्तुतियां सुनो, हमें विविध प्रकार का अन्न दो, सभी बुद्धियां हमें प्रदान करो तथा हमारे लिए गाय देने वाले बनो. (१०) नू ष्टुत इन्द्र नू गृणान इषं जरित्रे नद्यो३ न पीपेः. अकारि ते हरिवो ब्रह्म नव्यं धिया स्याम रथ्यः सदासाः.. (११) हे इंद्र! जिस प्रकार जल सरिता को पूर्ण करता है, उसी प्रकार तुम पूर्ववर्ती ऋषियों की तथा हमारी स्तुतियां सुनकर उन्हें स्वीकार करो एवं हमारा अन्न बढ़ाओ. हे हरि नामक घोड़ों के स्वामी इंद्र हमने तुम्हारे निमित्त नवीन स्तुतियां बनाई हैं. हम रथ के स्वामी एवं तुम्हारे सेवक बनें. (११) सूक्त—२३ देवता—इंद्र कथा महामवृधत्कस्य होतुर्रज्ञं जुषाणो अभि सोममूधः. पिबन्नुशानो जुषमाणो अन्धो ववक्ष ऋष्वः शुचते धनाय.. (१) हमारी स्तुति इंद्र को किस प्रकार बढ़ावे? इंद्र प्रसन्न होकर किस होता के यज्ञ में जावें? ebook converter DEMO Watermarks*