ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 724, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंसोमरस पीने वाले इंद्र धनवान्, लोभी एवं सोमरस न निचोड़ने वाले यजमान से मित्रता नहीं रखते. वे ऐसे लोगों के व्यर्थ धन को स्पष्ट करके नष्ट कर देते हैं. इंद्र सोमरस निचोड़ने वाले एवं हव्य पकाने वाले यजमान के ही घनिष्ठ मित्र बनते हैं. (७) इन्द्रं परेऽवरे मध्यमास इन्द्रं यान्तोऽवसितास इन्द्रम्. इन्द्रं क्षियन्त उत युध्यमाना इन्द्रं नरो वाजयन्तो हवन्ते.. (८) उत्कृष्ट, निकृष्ट अथवा मध्यम चलते हुए अथवा बैठे हुए, घर में रहने वाले अथवा युद्ध करते हुए एवं अन्न की इच्छा करने वाले लोग इंद्र को पुकारते हैं. (८) सूक्त—२६ देवता—इंद्र अहं मनुरभवं सूर्यश्चाहं कक्षीवाँ ऋषिरस्मि विप्र:. अहं कुत्समार्जुनेयं न्यृञ्जेऽहं कविरुशना पश्यता मा.. (१) मैं ही मनु था. मैं ही सविता हूं. मेधावी कक्षीवान् ऋषि भी मैं ही हूं. मैंने अर्जुनी के पुत्र कुत्स को अलंकृत किया था. मैं ही उशना कवि हूं. हे मनुष्यो! मुझे देखो. (१) अहं भूममददामार्यायाहं वृष्टिं दाशुषे मर्त्याय. अहमपो अनयं वावशाना मम देवासो अनु केतमायन्.. (२) मैंने आर्य मनु के लिए धरती दी थी. हव्य देने वाले लोगों को वर्षारूपी जल मैं ही देता हूं. मैं कलकल शब्द करते हुए जल को सभी स्थानों पर लाया था. देवगण मेरे ही संकल्प का अनुगमन करते हैं. (२) अहं पुरो मन्दसानो व्यैरं नव साकं नवती: शम्बरस्य. शततमं वेश्यं सर्वताता दिवोदासमतिथिग्वं यदावम्.. (३) मैंने सोमरस पीने से मतवाला होकर शंबर असुर के निन्यानवे नगरों को एक ही साथ नष्ट कर दिया है. मैंने यज्ञ में अतिथियों का स्वागत-सत्कार करने वाले दिवोदास को सौ सागर दिए थे. (३) प्र सु ष विभ्यो मरुतो विरस्तु प्र श्येन: श्येनेभ्य आशुपत्वा. अचक्रया यत्स्वधया सुपर्णो हव्यं भरन्मनवे देवजुष्टम्.. (४) हे मरुद्गण! श्येन पक्षी अन्य पक्षियों की अपेक्षा उत्तम हो. श्येन पक्षियों में भी सबसे तेज चलने वाला श्येन प्रधान हो, क्योंकि वही बिना पहियों वाले रथ द्वारा देवों से सेवित सोमरूप हव्य को मनु प्रजापति के निमित्त स्वर्ग से लाया था. (४) भरद्यदि विरतो वेविजान: पथोरुणा मनोजवा असर्जि. ebook converter DEMO Watermarks*