भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 723, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 723

को नानाम वचसा सोम्याय मनायुर्वा भवति वस्त उस्राः. क इन्द्रस्य युज्यं कः सखित्वं को भ्रात्रं वष्टि कवये क ऊती.. (२) कौन यजमान सोमरस के पात्र इंद्र को स्तुति रूपी वचन से नमस्कार करता है? कौन इंद्र की स्तुति की कामना करता है? इंद्र द्वारा दी हुई गायों को कौन रखता है? कौन इंद्र की सहायता चाहता है? कौन इंद्र के साथ मित्रता अथवा भाईचारा रखने का इच्छुक है? कौन क्रांतदर्शी इंद्र से रक्षा की प्रार्थना करता है? (२) को देवानमवो अद्या वृणीते क आदित्याँ अदितिं ज्योतिरीट्टे. कस्याश्विनाविन्द्रो अग्निः सुतस्यांशोः पिबन्ति मनसाविवेनम्.. (३) आज कौन यजमान इंद्र आदि देवों से रक्षा की प्रार्थना करता है? कौन आदित्य, अदिति एवं जल से प्रार्थना करता है? अश्विनीकुमार, इंद्र एवं अग्नि किस यजमान की स्तुति से प्रसन्न होकर उसके द्वारा निचोड़े हुए सोमरस को पीते हैं? (३) तस्मा अग्निर्भरतः शर्म यंसज्ज्योक्पश्यात्सूर्यमुच्चरन्तम्. य इन्द्राय सुनवामेत्याह नरे नर्याय नृतमाय नृणाम्.. (४) हवि के स्वामी अग्नि उस यजमान के लिए सुख दें एवं वह बहुत काल तक उदय होते हुए सूर्य को देखे जो कहता है कि मैं नेता, मानवों के हितैषी एवं मानवों में श्रेष्ठ इंद्र के लिए सोमरस निचोडूंगा. (४) न तं जिनन्ति बहवो न दभ्रा उर्वस्मा अदितिः शर्म यंसत्. प्रियः सुकृत्प्रिय इन्द्रे मनायुः प्रियः सुप्रावीः प्रियो अस्य सोमी.. (५) जो यजमान इंद्र के निमित्त सोमरस निचोड़ने का संकल्प करते हैं, उन्हें न थोड़े और न बहुत शत्रु जीत सकें. अदिति उन्हें सुख दें. शोभन एवं स्तुति की कामना करने वाले यजमान इंद्र के प्रिय हैं. भली-भांति समीप जाने वाले एवं सोमरस निचोड़ने वाले यजमान इंद्र के प्रिय हों. (५) सुप्राव्यः प्राशुषाळेष वीरः सुष्वेः पक्तिं कृणुते केवलेन्द्रः. नासुष्वेरापिर्न सखा न जामिर्दुष्प्राव्योऽवहन्तेदवाचः.. (६) शत्रुओं को शीघ्र हराने वाले तथा वीर इंद्र अपने समीप आने वाले तथा सोमरस निचोड़ने वाले यजमान के पुराडोश को तुरंत स्वीकार कर लेते हैं. इंद्र सोमरस न निचोड़ने वाले यजमान के निमित्त व्याप्त, सखा अथवा बंधु नहीं बनते. इंद्र स्तुतिहीन की हिंसा करते हैं. (६) न रेवता पणिना सख्यमिन्द्रोऽसुन्वता सुतपाः सं गृणीते. आस्य वेदः खिदति हन्ति नग्नं वि सुष्वये पक्तये केवलो भूत्.. (७) ebook converter DEMO Watermarks*