ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 745, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंकोई मनुष्य वस्त्र चुराने वाले चोर को देखकर चिल्लाता है. जिस प्रकार नीचे की ओर उतरते हुए भूखे बाज को देखकर पक्षी भाग जाते हैं, उसी प्रकार अन्न एवं पशु समूह को नष्ट करने के विचार से चलने वाले दधिक्रा को देखकर लोग भाग उठते हैं. (५) उत स्मासु प्रथमः सरिष्यन्नि वेवेति श्रेणिभी रथानाम्. स्रजं कृण्वानो जन्यो न शुभ्वा रेणुं रेरिहत्किरणं ददश्वान्.. (६) दधिक्रा देव असुरों की सेनाओं में जाने के इच्छुक होकर उन में श्रेष्ठ स्थान पाते हुए रथ की पंक्तियों के साथ चलते हैं. वे मानव-हितकारी घोड़े के समान अलंकृत हैं, धूल उड़ाते हैं एवं लगाम को बार-बार चबाते हैं. (६) उत स्य वाजी सहुरिर्ऋतावा शुश्रूषमाणस्तन्वा समर्य्ये. तुरं यतीषु तुरयन्नृजिप्योऽधि भ्रुवोः किरते रेणुमृञ्जन्.. (७) दधिक्रा देव इस प्रकार के घोड़ों के समान युद्ध में सहनशील, शत्रुओं के अन्न पर अधिकार करने वाले, अपने अंगों से ही अपनी सेवा करने वाले, सीधे चलने वाले, असुर सेनाओं में वेगपूर्ण, धूल उड़ाने वाले एवं उस धूल को अपनी ही भौंहों पर गिराने वाले हैं. (७) उत स्मास्य तन्यतोरिव द्योर्र्ऋघायतो अभियुजो भयन्ते. यदा सहस्रमभि भीमयोधीद्दुर्वर्तुः स्मा भवति भीम ऋञ्जन्.. (८) असुर दधिक्रा देव से इस प्रकार डरते हैं, जिस प्रकार लड़ने वाले लोग शब्द करते हुए वज्र से डरते हैं. वे चारों ओर हजारों लोगों से युद्ध करते हुए उत्तेजित अवस्था में अत्यंत भयंकर लगते हैं. कोई भी उन्हें रोकने का साहस नहीं कर पाता. (८) उत स्मास्य पनयन्ति जना जूतिं कृष्टिप्रो अभिभूतिमाशोः. उतैनमाहुः समिथे वियन्तः परा दधिक्रा असरत्सहस्रैः.. (९) मनुष्य इन दधिक्रा देव की सर्वाधिक गति की स्तुति करते हैं. वे मनुष्यों की अभिलाषा पूरी करने वाले एवं व्याप्त हैं. वे इनसे कहते हैं कि जब आप हजारों सैनिकों के साथ चलेंगे तो शत्रु हार जाएंगे. (९) आ दधिक्राः शवसा पञ्च कृष्टीः सूर्य इव ज्योतिषापस्ततान. सहस्रसाः शतसा वाज्यर्वा पृणक्तु मध्वा समिमा वचांसि.. (१०) सूर्य जिस प्रकार अपनी ज्योति से जल का विस्तार करते हैं, उसी प्रकार दधिक्रा देव अपने बल से पांचों प्रकार की प्रजाओं की वृद्धि करते हैं. सैकड़ों और हजारों धन देने वाले वेगशाली दधिक्रा देव हमारी स्तुतियां सुनकर मधुर फल दें. (१०) सूक्त—३९ देवता—दधिक्रा ebook converter DEMO Watermarks*