ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 744, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंतं नो वाजा ऋभुक्षण इन्द्र नासत्या रयिम् समश्वं चर्षणिभ्य आ पुरु शस्त मघत्तये.. (८) हे वाजगण, ऋभुओ, इंद्र एवं अश्विनीकुमारो! तुम हम स्तुतिकर्त्ता लोगों को देने के निमित्त अधिक मात्रा में धन एवं अन्न का वचन दो. (८) सूक्त—३८ देवता—द्यावा-पृथ्वी आदि उतो हि वां दात्रा सन्ति पूर्वा या पूरुभ्यस्त्रसदस्युर्नितोशे. क्षेत्रासां ददथुरुर्वरासां घनं दस्युभ्यो अभिभूतिमुग्रम्.. (१) हे द्यावा-पृथ्वी! प्राचीन काल में त्रसदस्यु नामक राजा ने धन पाकर मांगने वाले लोगों को दिया था. तुमने उसे घोड़ा, पुत्र एवं दस्युजनों को नष्ट करने योग्य बल दिया था. (१) उत वाजिनं पुरुनिष्षिध्वानं दधिक्रामु ददथुर्विश्वकृष्टिम्. ऋजिप्यं श्येनं प्रुषितप्सुमाशुं चर्कृत्यमर्यो नृपतिं न शूरम्.. (२) हे द्यावा-पृथ्वी! तुम दोनों गमनशील, बहुत से शत्रुओं को रोकने वाली, समस्त प्रजाओं की रक्षा करने वाली, शोभन-गति वाली, दीप्तिशालिनी, तेज चलने वाली एवं राजा के समान शूर दधिक्रा को धारण करते हो. (२) यं सीमनु प्रवतेव द्रवन्तं विश्वः पूरुर्मदति हर्षमाणः. पद्भिर्गृध्यन्तं मेध्युं न शूरं रथतुरं वातमिव ध्रजन्तम्.. (३) धरती-आकाश उस दधिक्रा को धारण करते हैं, जिसकी स्तुति प्रसन्नतापूर्वक सभी मनुष्य किया करते हैं. जिस तरह जल नीचे बहता है, वे उसी तरह गतिशील, युद्ध की इच्छा करने वाले, वीर के समान दिशाओं को लांघने हेतु तत्पर, रथ पर बैठकर चलने वाले एवं हवा की तरह तेज चलने वाले हैं. (३) यः स्मारुन्धानो गध्या समत्सु सनुतरश्चरति गोषु गच्छन्. आविर्ऋजीको विदथा निचिक्यत्तिरो अरतिं पर्याप आयोः.. (४) जो देव मिले हुए पदार्थों को संग्राम में पृथक्-पृथक् करता हुआ उपभोग करने के लिए सभी दिशाओं में जाता है, जिसकी शक्ति प्रकट है, जो जानने योग्य बातों को जानता है एवं स्तुति करने वाले यजमान के शत्रुओं का तिरस्कार करता है. (४) उत स्सैनं वस्त्रमथिं न तायुमनु क्रोशन्ति क्षितयो भरेषु. नीचायमानं जसुरिं न श्येनं श्रवश्चाच्छा पशुमच्च यूथम्.. (५) लोग संग्राम में दधिक्रा देव को देखकर उसी प्रकार चीखते-चिल्लाते हैं, जिस प्रकार ebook converter DEMO Watermarks*