भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 784, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 784

सं यदिषो वनामहे सं हव्या मानुषाणाम्. उत द्युम्नस्य शवस ऋतस्य रश्मिमा ददे.. (३) जब हम अग्नि को अन्न देते हैं एवं वे हमारा हव्य स्वीकार करते हैं, तब वे तेजस्वी अन्न की शक्ति द्वारा जल ग्रहण करने वाली किरणों को अपनाते हैं. (३) स स्मा कृणोति केतुम नक्तं चिद्दूर आसते. पावको यद्वनस्पतीन्प्र स्मा मिनात्यजरः.. (४) जब पवित्र करने वाले एवं जरारहित अग्नि वनस्पतियों को जलाते हैं, तब वे रात में दूर तक के लोगों को ज्ञान करा देते हैं. (४) अव स्म यस्य वेषणे स्वेदं पथिषु जुह्वति. अभीमह स्वजेन्यं भूमा पृष्ठेव रुरुहुः.. (५) अग्नि की सेवा के समय गिरी हुई घी की बूंदों को अध्वर्यु लोग ज्वालाओं में डाल देते हैं. पुत्र जिस प्रकार पिता की गोद में चढ़ जाता है, उसी प्रकार घी की धाराएं अग्नि पर चढ़ती हैं. (५) यं मर्त्यः पुरुस्पृहं विदद्विश्वस्य धायसे. प्र स्वादनं पितूनामस्ततातिं चिदायवे.. (६) यजमान बहुत लोगों द्वारा अभिलषित, सबको धारण करने वाले, अन्नों का भली प्रकार स्वाद लेने वाले एवं यजमानों को निवास देने वाले अग्नि को जानते हैं. (६) स हि ष्मा धन्वाक्षितं दाता न दात्या पशुः. हिरिश्मश्रुः शुचिदन्नुर्भुरनिभृष्टतविषिः.. (७) अग्नि घास खाने वाले पशुओं के समान जलहीन एवं घास, लकड़ी आदि से भरे हुए स्थान को छिन्न करते हैं. अग्नि सुनहरी दाढ़ी वाले, उज्ज्वल दांतों वाले, महान्, बाधा रहित एवं शक्तिशाली हैं. (७) शुचिः ष्म यस्मा अत्रिवत्प्र स्वधितीव रीयते. सुषूरसूत माता क्राणा यदानशे भगम्.. (८) वे अग्नि प्रज्वलित होते हैं, जिनके लिए यजमान अत्रि ऋषि के समान हवि देने जाते हैं एवं जो फरसे के समान वृक्षों का नाश करते हैं. अरणिरूपी माता ने उन अग्नि को जन्म दिया था जो संसार का उपकार करते हैं एवं अन्न ग्रहण करते हैं. (८) आ यस्ते सर्पिरासुतेऽग्ने शमस्ति धायसे. ebook converter DEMO Watermarks*