ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 792, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंदेवों के पास ले जाएंगे. (१) तमध्वरेष्वीळते देवं मर्ता अमर्त्यम्. यजिष्ठं मानुषे जने.. (२) मनुष्य यज्ञों में उस दीप्तिसंपन्न, मरणरहित एवं मानव प्रजाओं में अतिशय यज्ञपात्र अग्नि की स्तुति करते हैं. (२) तं हि शश्वन्त ईळते सुचा देवं घृतश्चुता. अग्निं हव्याय वोळ्हवे.. (३) बहुत से स्तोता घी से पूर्ण सुच लेकर देवों के समीप वहन करने के निमित्त यज्ञशाला में अग्नि देव की स्तुति करते हैं. (३) अग्निर्जातो अरोचत घ्नन्दस्यूञ्ज्योतिषा तमः. अविन्दद्गा अपः स्वः.. (४) अरणियों के मंथन से प्रादुर्भूत अग्नि अपने तेज से यज्ञ विनाशकारी दस्युजनों एवं अंधकार को समाप्त करते हुए प्रकाशित होते हैं. गाएं, जल एवं सूर्य अग्नि से ही प्रकट हुए हैं. (४) अग्निमीळेन्यं कविं घृतपृष्ठं सपर्यत. वेतु मे शृणवद्धवम्.. (५) हे मनुष्यो! स्तुति योग्य, क्रांतदर्शी एवं घृत के कारण दीप्त शिखा वाले अग्नि की पूजा करो. अग्नि हमारे इस आह्वान को सुनते हुए आवें. (५) अग्निं घृतेन वावृधुः स्तोमेभिर्विश्वचर्षणिम्. स्वाधीभिर्वचस्युभिः.. (६) ऋत्विजों ने घी एवं स्तुतियों द्वारा शोभन ध्यान वाले तथा स्तुतियों की कामना करने वाले देवों के साथ विश्वदर्शक अग्नि को घी की सहायता से बढ़ाया. (६) सूक्त—१५ देवता—अग्नि प्र वेधसे कवये वेद्याय गिरं भरे यशसे पूर्व्याय. घृतप्रसत्तो असुरः सुशेवो रायो धर्ता धरुणो वस्वो अग्निः.. (१) हम विधाता, क्रांतदर्शी, स्तुति के योग्य, यशस्वी, मुख्य, घृत रूप हवि द्वारा प्रसन्न होने वाले, बलशाली, शोभन सुखयुक्त, धन के पोषक, हव्यवाहक एवं निवासस्थान देने वाले अग्नि के लिए स्तुतियां निर्मित करते हैं. (१) ऋतेन ऋतं धरुणं धारयन्त यज्ञस्य शाके परमे व्योमन्. दिवो धर्मन्धरुणे सेदुषो नॄञ्जातैरजाताँ अभि ये ननक्षुः.. (२) जो यजमान ऋत्विजों की सहायता से स्वर्ण को धारण करने वाले, यज्ञशाला में बैठे हुए ebook converter DEMO Watermarks*