ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 810, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूक्त—३१ देवता—इन्द्र इन्द्रो रथाय प्रवतं कृणोति यमध्यस्थान्मघवा वाजयन्तम्. यूथेव पश्वो व्युनोति गोपा अरिष्टो याति प्रथमः सिषासन्.. (१) धन के स्वामी इंद्र, जिस अन्नाभिलाषी रथ पर बैठते हैं, उसे हांकते भी हैं. जैसे ग्वाला पशुओं के समूह को हांकता है, उसी प्रकार इंद्र शत्रुओं को भगाते हैं. अपराजित एवं देवश्रेष्ठ इंद्र शत्रुओं के धन को चाहते हुए चलते हैं. (१) आ प्र द्रव हरिवो मा वि वेनः पिशङ्गराते अभि नः सचस्व. नहि त्वदिन्द्र वस्यो अन्यदस्त्यमेनांश्चिज्जनिवतश्चकर्थ.. (२) हे हरि नामक घोड़ों के स्वामी इंद्र! तुम सबके सम्मुख भली प्रकार गमन करो. तुम हमारे प्रति इच्छारहित मत होना. हे विविध धनों के स्वामी! तुम हमारी सेवा स्वीकार करो. हे इंद्र! तुमसे श्रेष्ठ कोई नहीं है. तुम पत्नीरहितों को पत्नीयुक्त करते हो. (२) उद्यत्सहः सहस आजनिष्ट देदिष्ट इन्द्र इन्द्रियाणि विश्वा. प्राचोदयत्सुदुघा वव्रे अन्तर्वि ज्योतिषा संववृत्वत्तमोऽवः.. (३) जब सूर्य का प्रकाश उषा के प्रकाश से उत्पन्न होकर श्रेष्ठ बनता है, तब इंद्र यजमानों को सभी प्रकार का धन देते हैं. वे पर्वत के मध्य से दुधारू गायों को छुड़ाते हैं एवं अपने प्रकाश से ढकने वाले अंधकार को नष्ट करते हैं. (३) अनवस्ते रथमश्वाय तक्षन्त्वष्टा वज्रं पुरुहूत द्युमन्तम्. ब्रह्माण इन्द्रं महयन्तो अर्कैरवर्धयन्नहये हन्तवा उ.. (४) हे अनेक जनों द्वारा बुलाए गए इंद्र! ऋभुओं ने तुम्हारे रथ को घोड़ों से जुड़ने योग्य बनाया था एवं त्वष्टा ने तुम्हारे वज्र को चमकाया था. अंगिरावंशीय ऋषियों ने अपने स्तोत्रों द्वारा वृत्र को मारने के लिए तुम्हें उत्तेजित किया था. (४) वृष्णे यत्ते वृषणो अर्कमर्चानिन्द्र ग्रावाणो अदितिः सजोषाः. अनश्वासो ये पवयोऽरथा इन्द्रेषिता अभ्यवर्तन्त दस्यून्.. (५) हे कामवर्षी इंद्र! जब वर्षा करने में समर्थ मरुतों ने तुम्हारी स्तुति की, तब सोम निचोड़ने वाले पत्थर भी प्रसन्नतापूर्वक मिल गए थे. बिना रथ एवं बिना घोड़ों वाले मरुतों ने इंद्र की प्रेरणा पाकर असुरों को पराजित किया था. (५) प्र ते पूर्वाणि करणानि वोचं प्र नूतना मघव न्या चकर्थ. शक्तीवो यद्विभरा रोदसी उभे जयन्नपो मनवे दानुचित्राः.. (६)