भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 814, कुल 1855 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 814

नारी के समान इंद्र को आत्मसमर्पण करती है. इंद्र जब अपनी शक्ति को सभी प्रजाओं में मिला देते हैं, तब लोग बलशाली इंद्र के सामने क्रमपूर्वक झुकते हैं. (१०) एकं नु त्वा सत्पतिं पाञ्चजन्यं जातं शृणोमि यशसं जनेषु. तं मे जगृभ्र आशसो नविष्ठं दोषा वस्तोर्हवमानास इन्दम्.. (११) हे इंद्र! हमने ऋषियों से तुम्हें मानवों में प्रमुख, सज्जनों का पालनकर्त्ता, पंचजनों के कल्याण के लिए उत्पन्न एवं यशस्वी सुना है. रात-दिन स्तुति करने वाले एवं अभिलाषाओं का वर्णन करने वाले हमारे पुत्र-पौत्र अतिशय स्तुतिपात्र इंद्र को प्राप्त करें. (११) एवा हि त्वामृतुथा यातयन्तं मघा विप्रेभ्यो ददतं शृणोमि. किं ते ब्रह्माणो गृहते सखायो ये त्वाया निदधुः काममिन्द्र.. (१२) हे इंद्र! तुम समय-समय पर प्राणियों को प्रेरित करते हो एवं स्तुति करने वाले को धन देते हो, हमने ऐसा सुना है. जो स्तोता अपनी इच्छा तुम में स्थित कर देते हैं, तुम्हारे मित्र वे तुमसे क्या प्राप्त करते हैं? (१२) सूक्त—३३ देवता—इंद्र महि महे तवसे दीध्ये नृनिन्द्रायेत्था तवसे अतव्यान्. यो अस्मै सुमतिं वाजसातौ स्तुतो जने समर्यश्चिकेत.. (१) मैं परम दुर्बल संवरण ऋषि परम शक्तिशाली इंद्र के लिए उत्तम स्तुति बोलता हूं. उससे मेरे समान लोग शक्तिशाली बनेंगे. संग्राम में अन्नलाभ करने के उद्देश्य से स्तुति सुनकर इंद्र मुझ संवरण के स्तोताओं पर कृपा करें. (१) स त्वं न इन्द्र धियसानो अर्कैर्हरीणां वृषन्योक्त्रमश्रेः. या इत्था मघवन्ननु जोषं वक्षो अभि प्रार्यः सक्षि जनान्.. (२) हे कामवर्षी एवं धनस्वामी इंद्र! तुम हमारा ध्यान करते हुए एवं प्रसन्नता उत्पन्न करने वाले स्तोत्रों के कारण रथ में जुते हुए घोड़ों की लगाम पकड़ते हुए अपने शत्रुओं को पराजित करो. (२) न ते त इन्द्राभ्य१स्मदृष्वायुक्तासो अब्रह्मता यदसन्. तिष्ठा रथमधि तं वज्रहस्ता रश्मिं देव यमसे स्वश्वः.. (३) हे महान् इंद्र! जो हम लोगों अर्थात् तुम्हारे भक्तों से भिन्न हैं, तुमसे जो संयुक्त नहीं हैं एवं यज्ञकर्म अर्थात् यज्ञ नहीं करते हैं, वे तुम्हारे मनुष्य नहीं हैं. हे हाथ में वज्र लेने वाले इंद्र! हमारे यज्ञ में आने के लिए तुम रथ को स्वयं हांकते हो. (३) ebook converter DEMO Watermarks*