ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 818, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंयदिन्द्र ते चतस्रो यच्छूर सन्ति तिस्रः. यद्वा पञ्च क्षितीनामवस्तस्तु नु आ भर.. (२) हे शूर इंद्र! चार वर्षों, तीन लोकों एवं पांच जनों से संबंधित जो तुम्हारी रक्षा है, वह हमें प्रदान करो. (२) आ तेऽवो वरेण्यं वृषन्तमस्य हूमहे. वृषजूतिर्हि जज्ञिष आभूभिरिन्द्र तुर्वणिः.. (३) हे कामपूरकों में श्रेष्ठ, वर्षा करने वाले एवं शत्रुओं को शीघ्र मारने वाले इंद्र! तुम्हारा रक्षाकार्य उत्तम है. हम उसे पुकारते हैं. तुम सर्वव्यापक मरुतों के साथ हमारी रक्षा करो. (३) वृषा ह्यसि राधसे जज्ञिषे वृष्णि ते शवः. स्वक्षत्रं ते धृषन्मनः सत्राहामिन्द्र पौंस्यम्.. (४) हे इंद्र! तुम कामवर्षी हो, यजमानों को धन देने हेतु उत्पन्न हुए हो एवं तुम्हारा बल अभिलाषापूरक है. तुम्हारा मन शक्तिशाली एवं विरोधियों को हराने वाला है. तुम्हारा पौरुष समूह नष्ट करने वाला है. (४) त्वं तमिन्द्र मर्त्यममित्रयन्तमद्रिवः. सर्वरथा शतक्रतो नि याहि शवसस्पते.. (५) हे वज्रधारी, शतक्रतु एवं शक्ति के स्वामी इंद्र! तुम शत्रुता का आचरण करने वाले के प्रति अपने सर्वत्रगामी रथ द्वारा चलते हो. (५) त्वामिद्वृत्रहन्तम जनासो वृक्तबर्हिषः. उग्रं पूर्वीषु पूर्व्यं हवन्ते वाजसातये.. (६) हे शत्रुओं को मारने वाले इंद्र! यज्ञ में कुश बिछाने वाले यजमान युद्ध में सहायता के लिए वज्र उठाए हुए एवं प्रजाओं के मध्य प्राचीन तुझ इंद्र को ही पुकारते हैं. (६) अस्माकमिन्द्र दुष्टरं पुरोयावानमाजिषु. सयावानं धनेधने वाजयन्तमवा रथम्.. (७) हे इंद्र! तुम हमारे दुस्तर, युद्धों में आगे चलने वाले, अनुचरों सहित व युद्ध में सभी प्रकार के धनों की इच्छा करने वाले रथ की रक्षा करो. (७) अस्माकमिन्द्रेहि नो रथमवा पुरन्ध्या. वयं शविष्ठ वार्यं दिवि श्रवो दधीमहि दिवि स्तोमं मनामहे.. (८) हे इंद्र! तुम हमारे पास आत्मीय बनकर आओ एवं अपनी उत्तम बुद्धि द्वारा हमारे रथ ebook converter DEMO Watermarks*