भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 829, कुल 1855 में से

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बनते हैं. तुम्हारा अनुग्रह पाने वालों में जो संपत्तिशाली लोग अश्व, गाय या कपड़े का दान करते हैं, उनके पास धन हो. (८) विसर्माणं कृणुहि वित्तमेषां भुञ्जते अपृणन्तो न उक्थैः. अपव्रतानप्रसवे वावृधानान्ब्रह्मद्विषः सूर्याद्यावयस्व.. (९) हे बृहस्पति! तुम ऐसे लोगों का धन नष्ट कर दो जो अपना धन हम स्तुतिकर्त्ताओं को न देकर उसका स्वयं उपभोग करते हैं. जो व्रतों का पालन नहीं करते हैं एवं मंत्रों से द्वेष रखते हैं, वे लोग इस संसार में बढ़ रहे हैं. तुम उन्हें सूर्य से अलग करो. (९) य ओहते रक्षसो देववीतावचक्रेभिस्तं मरुतो नि यात. यो वः शर्मीं शशमानस्य निन्दात्तुच्छ्यान्कामान्करते सिष्विदानः.. (१०) हे मरुतो! जो यजमान देवयज्ञ में राक्षसों को बुलाता है जो तुम्हारे कर्म की स्तुति करने वाले की निंदा करता है और जो सांसारिक भोगों के लिए क्लेश उठाता है, उसे तुम बिना पहियों वाले रथ द्वारा अंधकार में डाल दो. (१०) तमु ष्टुहि यः स्विषुः सुधन्वा यो विश्वस्य क्षयति भेषजस्य. यक्ष्वा महे सौमनसाय रुद्रं नमोभिर्देवमसुरं दुवस्य.. (११) हे आत्मा! तुम उन्हीं रुद्रदेव की स्तुति करो, जो शोभन-धनुष वाले एवं सभी ओषधियों के स्वामी हैं, महान् आत्म-कल्याण के लिए उन्हीं शक्तिशाली रुद्र का यज्ञ एवं सेवा करो. (११) दमूनसो अपसो ये सुहस्ता वृष्णः पत्नीर्नद्यो विभ्वतष्टाः. सरस्वती बृहद्दिवोत राका दशस्यन्तीर्वरिवस्यन्तु शुभ्राः.. (१२) दानशील मन वाले एवं हाथ से कुशलतापूर्वक शोभनकर्म करने वाले ऋभुगण वर्षा करने वाले इंद्र की पत्नियां सरिताएं विभु द्वारा निर्मित सरस्वती नदी व परम दीप्तिशालिनी राका कामनाएं पूर्ण करने वाली एवं दीप्त हैं. वे हमें धन दें. (१२) प्र सू महे सुशरणाय मेधां गिरं भरे नव्यसीं जायमानाम्. य आहना दुहितुर्वक्षणासु रूपा मिनानो अकृणोदिदं नः.. (१३) महान् एवं उत्तम-शरण देने वाले इंद्र के प्रति मैं बुद्धिमत्तापूर्ण नवरचित स्तुतियों को बोलता हूं. वे वर्षा करने वाले, कन्यारूपी धरती की नदियों को रूप देने वाले एवं हमारे लिए जल का निर्माण करने वाले हैं. (१३) प्र सुष्टुतिः स्तनयन्तं रुवनमीळस्पतिं जरितर्नूनमश्याः. यो अब्दिमाँ उदनिमाँ इयर्ति प्र विद्युता रोदसी उक्षमाणः.. (१४) ebook converter DEMO Watermarks*