भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 840, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 840

अनन्तास उरवो विश्वतः सीं परि द्यावापृथिवी यन्ति पन्थाः.. (२) अपरिमित, व्याप्त एवं प्रकाशनरूप कर्म करती हुई सूर्यकिरणें सूर्य मंडल के साथ एकत्र होकर स्वर्ग, धरती एवं आकाश में गतिशील होती हैं. (२) उक्षा समुद्रो अरुषः सुपर्णः पूर्वस्य योनिं पितुरा विवेश. मध्ये दिवो निहितः पृश्निरश्मा वि चक्रमे रजसस्पत्यन्तौ.. (३) अभिलाषाएं पूर्ण करने वाले, देवों को प्रमुदित करने वाले, दीप्तिशाली व शोभन- गतियुक्त रथ ने अंतरिक्ष की पूर्व दिशा में प्रवेश किया था. इसके बाद स्वर्ग के बीच में छिपे हुए, विविध रंगों वाले एवं सर्वव्यापक सूर्य आकाश के पूर्व और पश्चिम भाग में विचरण करके रक्षा करते रहें. (३) चत्वार ईं बिभ्रति क्षेमयन्तो दश गर्भं चरसे धापयन्ते. त्रिधातवः परमा अस्य गावो दिवश्चरन्ति परि सद्यो अन्तान्.. (४) अपने कल्याण की अभिलाषा वाले चार ऋत्विज् स्तुतियों एवं हव्य द्वारा सूर्य को धारण करते हैं. दश-दिशाएं सूर्य को चलने के लिए प्रेरित करती हैं. सूर्य की तीन प्रकार की किरणें उत्तमतापूर्वक आकाश के अंत तक शीघ्रतापूर्वक गमन करती हैं. (४) इदं वपुर्निवचनं जनासश्चरन्ति यन्नद्यस्तस्थुरापः. द्वे यदीं बिभृतो मातुरन्ये इहेह जाते यम्या३ सबन्धू.. (५) हे ऋत्विजो! सामने दिखाई देता हुआ यह मंडल अतिशय स्तुति योग्य है. इसमें शोभन नदियां बहती हैं एवं हमारा पालन करती हैं. अंतरिक्ष के अतिरिक्त माता-पिता के समान धरती और आकाश स्थित रात-दिन इसीसे उत्पन्न होते हैं एवं इसे धारण करते हैं. (५) वि तन्वते धियो अस्मा अपांसि वस्त्रा पुत्राय मातरो वयन्ति. उपप्रक्षे वृषणो मोदमाना दिवस्पथा वध्वो यन्त्यच्छ.. (६) इसी सूर्य के लिए बुद्धिमान् यजमान यज्ञकर्म आरंभ करते हैं. उषारूपी माताएं इसी के लिए तेजस्वी कपड़े बुनती हैं. वर्षाकारी सूर्य के मिलन से प्रसन्न पत्नीरूपी किरणें आकाश मार्ग से हमारे पास आती हैं. (६) तदस्तु मित्रावरुणा तदग्ने शं योरस्मभ्यमिदमस्तु शस्तम्. अशीमहि गाधमुत प्रतिष्ठां नमो दिवे बृहते सादनाय.. (७) हे मित्र व वरुण! यह स्तोत्र हमारे सुख का कारण हो. हे अग्नि! यह स्तोत्र हमें सुख दें. हम लंबी आयु एवं प्रतिष्ठा का अनुभव करें. दीप्तिशाली, महान् एवं सबको सुख देने वाले सूर्य को नमस्कार है. (७) ebook converter DEMO Watermarks*