ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 849, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंको वेद जानमेषां को वा पुरा सुम्नेष्वास मरुताम्. यद्युयुञ्जे किलास्यः.. (१) इन मरुतों का जन्म कौन जानता है? मरुतों का सुख सर्वप्रथम किसने अनुभव किया? जब इन्होंने रथ में पृश्नि को जोड़ा था, तब इनकी शक्ति किसने जानी? (१) ऐतान्नथेषु तस्थुषः कः शुश्राव कथा ययुः. कस्मै ससुः सुदासे अन्वापय इळाभिर्वृष्टयः सह.. (२) मरुतों को रथ पर बैठा हुआ किसने सुना था? इनके गमन का ढंग कौन जानता है? बंधुरूप एवं वर्षाकारक मरुद्गण अन्न लेकर किस दानशील के लिए अवतीर्ण होते हैं? (२) ते म आहुर्य आययुरप द्युभिर्विभिर्मदे. नरो मर्या अरेपस इमान्पश्यन्निति ष्टुहि.. (३) तेजस्वी घोड़ों पर सवार होकर जो मरुद्गण सोमरस का आनंद प्राप्त करने आए थे, उन्होंने मुझसे कहा कि वे नेता, मानव हितकारी एवं आसक्तिरहित हैं. हे ऋषि! इस प्रकार के मरुतों को देखकर उनकी स्तुति करो. (३) ये अञ्जिषु ये वाशीषु स्वभानवः स्रक्षु खादिषु. श्रया रथेषु धन्वसु.. (४) हे मरुतो! तुम्हारे आभरणों, आयुधों, मालाओं, सीने पर पहने जाने वाले गहनों, हाथ- पैरों एवं उन में पहने जाने वाले कंकणों, रथों एवं धनुषों में जो बल आश्रित है, उसकी हम स्तुति करते हैं. (४) युष्माकं स्मा रथाँ अनु मुदे दधे मरुतो जीरदानवः. वृष्टी द्यावो यतीरिव.. (५) हे शीघ्र दान करने वाले मरुतो! वर्षा के निमित्त सभी जगह जाने वाली दीप्ति के समान तुम्हारे रथ को देखकर हम प्रमुदित होते हैं. (५) आ यं नरः सुदानवो ददाशुषे दिवः कोशमचुच्यवुः. वि पर्जन्यं सृजन्ति रोदसी अनु धन्वना यन्ति वृष्टयः.. (६) नेता एवं शोभन दान वाले मरुद्गण हवि देने वाले यजमान के कल्याण के लिए आकाश से बादल को बरसाते हैं. वे धरती एवं आकाश के कल्याण के लिए बादल को छोड़ते हैं. वर्षा करने वाले मरुत् सभी जगह जाने वाले जल के साथ गमन करते हैं. (६) तत्प्रदानाः सिन्धवः क्षोदसा रजः प्र सस्रुर्धेनवो यथा. ebook converter DEMO Watermarks*