ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 852, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंविद्युन्महसो नरो अश्मदिद्यवो वातत्विषो मरुतः पर्वतच्युतः. अब्दया चिन्मुहुरा हादुनीवृतः स्तनयदमा रभसा उदोजसः.. (३) बिजलीरूपी तेज वाले, वर्षा आदि के नेता, पत्थरों के आयुध वाले, दीप्ति प्राप्त करने वाले, पर्वतों को च्युत करने वाले, बार-बार जल देने वाले, वज्र को प्रेरित करने वाले, मिलकर गर्जन करने वाले एवं उद्धृत बलसंपन्न मरुद्गण वर्षा के निमित्त प्रकट होते हैं. (३) व्य१क्तून्रुद्रा व्यहानि शिक्वसो व्य१न्तरिक्षं वि रजांसि धूतयः. वि यदज्राँ अजथ नाव ईं यथा वि दुर्गाणि मरुतो नाह रिष्यथ.. (४) हे रुद्रो! तुम रात्रि एवं दिन को प्रकट करो. हे सर्वथा समर्थ मरुतो! तुम अंतरिक्ष तथा अन्य लोकों को विस्तृत करो. हे कंपाने वाले मरुतो! सागर जिस प्रकार नाव को हिलाता है, उसी प्रकार तुम बादलों को चंचल बनाओ एवं शत्रुनगरों को नष्ट करो. हे मरुतो! हमारी हिंसा मत करना. (४) तद्गीर्यं वो मरुतो महित्वनं दीर्घं ततान सूर्यो न योजनम्. एता न यामे अगृभीतशोचिषोऽनश्वदां यन्नययातना गिरिम्.. (५) हे मरुतो! जिस प्रकार सूर्य अपना प्रकाश फैलाते हैं अथवा देवों के घोड़े दूर-दूर तक जाते हैं, उसी प्रकार स्तोता तुम्हारे बल एवं महत्त्व को दूर तक प्रसिद्ध बनाते हैं. हे मरुतो! तुमने उस पर्वत को तोड़ा था, जिस में पणियों ने चुराए हुए घोड़े छिपाए थे. (५) अभ्राजि शर्धो मरुतो यदर्णसं मोषाथ वृक्षं कपनेव वेधसः. अध स्मा नो अरमतिं सजोषसश्चक्षुरिव यन्तमनु नेषथा सुगम्.. (६) हे वर्षा करने वाले एवं वृक्षों के समान बादलों को कंपित करने वाले मरुतो! तुम्हारी शक्ति सुशोभित हो रही है. हे परस्पर प्रीतिसंपन्न मरुतो! जिस प्रकार आंखें मार्ग प्रदर्शन करती हैं, उसी प्रकार तुम हमें सरल मार्ग से रमणीय धन के समीप पहुंचाओ. (६) न स जीयते मरुतो न हन्यते न स्रेधति न व्यथते न रिष्यति. नास्य राय उप दस्यन्ति नोतय ऋषिं वा यं राजानं वा सुषूदथ.. (७) हे मरुतो! तुम जिस ऋषि या राजा को यज्ञकर्म में लगाते हो, वह दूसरों द्वारा न हारता है और न मारा जाता है. वह न क्षीण होता है, न कष्ट पाता है और न उसे कोई बाधा पहुंचा सकता है. उसका धन एवं रक्षा साधन भी कभी समाप्त नहीं होते. (७) नियुत्वन्तो ग्रामजितो यथा नरोऽर्यमणो न मरुतः कवन्धिनः. पिन्वन्त्युत्सं यदिनासो अस्वरन्युन्दन्ति पृथिवीं मध्वो अन्धसा.. (८) नियुत नाम वाले घोड़ों के स्वामी, संयुक्त पदार्थों को पृथक् करने वाले तथा नेता, सूर्य ebook converter DEMO Watermarks*