भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

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मांगते हैं. (१३) अतीयाम निदस्तिरः स्वस्तिभिर्हित्त्वावद्यमरातीः. वृष्ट्वी शं योराप उस्रि भेषजं स्याम मरुतः सह.. (१४) हे मरुतो! हम कल्याणों द्वारा पाप को त्यागकर निंदक-शत्रुओं पर विजय प्राप्त करें. तुम्हारे द्वारा की गई वर्षा से हम सुख, पापों का नाश, जल, गायों एवं ओषधियों को पावें. (१४) सुदेवः समहासति सुवीरो नरो मरुतः स मर्त्यः. यं त्रायध्वे स्याम ते.. (१५) हे पूजित एवं नेता मरुतो! तुम जिस मनुष्य की रक्षा करते हो, वह अन्य देवों का कृपापात्र एवं उत्तम पुत्र-पौत्रों वाला बनता है. हम तुम्हारे सेवक इसी प्रकार बनें. (१५) स्तुहि भोजांत्स्तुवतो अस्य यामनि रणन्गावो न यवसे. यतः पूर्वाँ इव सखीँरनु ह्वय गिरा गृणीहि कामिनः.. (१६) हे ऋषि! स्तुति करने वाले इस यजमान के यज्ञ में तुम फल देने वाले मरुतों की स्तुति करो. गाएं जैसे घास चरने के लिए चलती हुई प्रसन्न होती हैं, उसी प्रकार मरुत् प्रसन्न हों. तेज चलने वाले मरुतों को पुराने मित्र के समान बुलाओ एवं स्तुति की अभिलाषा करने वाले मरुतों की वचनों से स्तुति करो. (१६) सूक्त—५४ देवता—मरुद्गण प्र शर्धाय मारुताय स्वभानव इमां वाचमनजा पर्वतच्युते. घर्मस्तुभे दिव आ पृष्टयज्वने द्युम्नश्रवसे महि नृम्णमर्चत.. (१) स्वायत्त, तेज वाले, पर्वतों को च्युत करने वाले, धूप का शोषण करने वाले, स्वर्ग से आने वाले, रथ के उपरिभाग पर विराजमान एवं तेजस्वी अन्न वाले मरुतों के बल की प्रशंसा करो तथा उन्हें पर्याप्त अन्न दो. (१) प्र वो मरुतस्तविषा उदन्यवो वयोवृधो अश्वयुजः परिज्ग्रयः. सं विद्युता दधति वाशति त्रितः स्वरन्त्यापोऽवना परिज्ग्रयः.. (२) हे मरुतो! तुम्हारे दीप्त, जगत् की रक्षा के लिए जल के इच्छुक, अन्न की वृद्धि करने वाले, चलने के लिए रथ में जोड़ने वाले सभी ओर गमनशील, बिजली के साथ संगत होने वाले व तीन स्थानों में शब्द करने वाले गण प्रकट होते हैं एवं जलराशि धरती पर गिरने लगती है. (२) ebook converter DEMO Watermarks*