भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 869, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 869

हे मित्र एवं वरुण! तुम दोनों अपनी अतिशय बुद्धि द्वारा मनोयोग के साथ स्तुति करने वाले मुझ स्तोता को वांछित सुख दो. तुम्हारे द्वारा दिया हुआ प्रशंसनीय सुख सारी धरती पर गमन करता है. (२) यन्नूनमश्यां गतिं मित्रस्य यायां पथा. अस्य प्रियस्य शर्मण्यहिंसानस्य सश्चिरे.. (३) जब हमें निश्चित रूप से गति प्राप्त हो, तब हम मित्र द्वारा दिखाए मार्ग से चलें एवं प्रिय मित्र का सुख हमें अपने घर में मिले. (३) युवाभ्यां मित्रावरुणोपमं धेयामृचा. यद्ध क्षये मघोनां स्तोतॄणां च स्पूर्धसे.. (४) हे मित्र एवं वरुण! तुम दोनों की स्तुति द्वारा हम ऐसा धन प्राप्त करेंगे, जिसके कारण धनस्वामियों एवं स्तोताओं के घरों में स्पर्धा होने लगे. (४) आ नो मित्र सुदीतिभिर्वरुणश्च सधस्थ आ. स्वे क्षये मघोनां सखीनां च वृधसे.. (५) हे मित्र एवं वरुण! तुम शोभन दीप्ति से युक्त होकर हमारे यज्ञ में आओ, हम धनस्वामी, हव्य देने वाले एवं तुम्हारे मित्र हैं. तुम हमारे घरों को संपन्न बनाओ. (५) युवं नो येषु वरुण क्षत्रं बृहच्च बिभृथः. उरु णो वाजसातये कृतं राये स्वस्तये.. (६) हे मित्र एवं वरुण! तुम अपनी स्तुतियों के कारण हमारे लिए शक्ति एवं पर्याप्त अन्न धारण करते हो. तुम हमारे लिए अन्न, धन एवं कल्याण प्रदान करो. (६) उच्छन्त्यां मे यजता देवक्षत्रे रुशद्गवि. सुतं सोमं न हस्तिभिरा पद्भिर्धावतं नरा बिभ्रतावर्चनानसम्.. (७) हे नेता मित्र व वरुण! उषाकाल की सुंदर किरणों वाले प्रातः सवन में एवं देवयज्ञ में निचोड़े गए सोमरस के कारण प्रसन्न होकर तुम अपने घोड़ों की सहायता से मुझ अर्चनाना के पास आओ. (७) सूक्त—६५ देवता—मित्र व वरुण यश्चिकेत स सुक्रतुर्देवत्रा स ब्रवीतु नः वरुणो यस्य दर्शतो मित्रो वा वनते गिरः.. (१) जो शोभन कर्म वाला स्तोता देवों में श्रेष्ठ तुम दोनों की स्तुति जानता है एवं सुंदर तुम दोनों—मित्र व वरुण—जिसकी स्तुतियों को स्वीकार करते हो, वही हमें स्तुति के विषय में बतावे. (१) eBook converter DEMO Watermarks*