ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 870, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंता हि श्रेष्ठवर्चसा राजाना दीर्घश्रुत्तमा. ता सत्पती ऋतावृध ऋतावाना जनेजने.. (२) प्रशंसनीय तेज वाले, स्वामी, बहुत दूर से पुकार सुनने वाले, यजमानों के रक्षक एवं यज्ञ की वृद्धि करने वाले मित्र व वरुण सभी स्तोताओं के कल्याण के लिए घूमते हैं. (२) ता वामियानोऽवसे पूर्वा उप ब्रुवे सचा. स्वश्वासः सु चेतुना वाजाँ अभि प्र दावने.. (३) हे पुरातन मित्र एवं वरुण! मैं तुम्हारे समीप पहुंचकर अपनी रक्षा के लिए प्रार्थना करता हूं. तुम शोभन ज्ञान वालों की स्तुति मैं उत्तम घोड़े एवं विविध अन्न पाने के लिए करता हूं. (३) मित्रो अंहोश्चिदादुरु क्षयाय गातुं वनते. मित्रस्य हि प्रतूर्वतः सुमतिरस्ति विधतः.. (४) मित्र पापी स्तोता को भी गृहस्वामी बनने का उपाय बताते हैं. यदि सेवक हिंसा करने वाला हो, तब भी मित्र शोभन बुद्धि रखते हैं. (४) वयं मित्रस्यावसि स्याम सप्रथस्तमे. अनेहसस्त्वोतयः सत्रा वरुणशेषसः.. (५) हम यजमान मित्र की परम प्रसिद्ध रक्षा के अंतर्गत हों. हे मित्र! पापरहित हम तुम्हारे द्वारा रक्षित होकर शीघ्र ही वरुण को पुत्र तुल्य प्रिय बनें. (५) युवं मित्रेमं जनं यथथः सं च नयथः. मा मघोनः परि ख्यतं मो अस्माकमृषीणां गोपीथे न उरुष्यतम्.. (६) हे मित्र व वरुण! तुम मुझ स्तोता के पास आकर मेरी इच्छा पूरी करो. मुझ हव्य धारण करने वाले का तुम त्याग न करना एवं हम ऋषियों तथा पुत्रों को मत छोड़ना. सोमयज्ञ में हमारी रक्षा करना. (६) सूक्त—६६ देवता—मित्र व वरुण आ चिकितान सुक्रतू देवौ मर्त रिशादसा. वरुणाय ऋतपेशसे दधीत प्रयसे महे.. (१) हे ज्ञानी व्यक्ति! तुम शोभन कर्म वाले एवं शत्रुनाशक मित्र व वरुण को पुकारो तथा जलरूप, अन्न के स्वामी एवं महान् वरुण को हव्य दो. (१) ता हि क्षत्रमविह्रुतं सम्यगसुर्य१ माशाते. ebook converter DEMO Watermarks*