ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 907, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंसे युक्त धन दो. हे वैश्वानर! हम तुम्हारी रक्षा पाकर सैकड़ों एवं हजारों प्रकार का अन्न पावें. (६) अदब्धेभिस्तव गोपाभिरिष्टेऽस्माकं पाहि त्रिषधस्थ सूरीन्. रक्षा च नो ददुषां शर्धो अग्ने वैश्वानर प्र च तारीः स्तवानः.. (७) हे यज्ञपात्र एवं तीनों लोकों में वर्तमान अग्नि! तुम अपने अपराजेय एवं रक्षा करने वाले तेजों द्वारा हम स्तुतिकर्त्ताओं की रक्षा करो. हे वैश्वानर! हम हव्यदाताओं के बल की रक्षा करो तथा स्तुतिकर्त्ताओं को बढ़ाओ. (७) सूक्त—९ देवता—वैश्वानर (अग्नि) अहश्च कृष्णमहरर्जुनं च वि वर्तेते रजसी वेद्याभिः. वैश्वानरो जायमानो न राजावातिरज्ज्योतिषाग्निस्तमांसि.. (१) काली रात और उजला दिन अपनी प्रवृत्तियों द्वारा धरती व आकाश को पृथक् करते हैं. वैश्वानर अग्नि तेजस्वी के समान उत्पन्न होकर अपने प्रकाश से अंधकार का नाश करते हैं. (१) नाहं तन्तुं न वि जानाम्योतुं न यं वयन्ति समरेऽतमानाः. कस्य स्वित्पुत्र इह वक्त्वानि परो वदात्यवरेण पित्रा.. (२) हम ताना-बाना नहीं जानते. लगातार प्रयत्न करके बुने गए कपड़े से भी हम परिचित नहीं हैं. इस लोक में रहने वाले पिता का उपदेश सुनने वाला पुत्र दूसरे लोक की बात कैसे कह सकता है? (२) स इत्तन्तुं स वि जानात्योतुं स वक्त्वान्यूतुथा वदाति. य ईं चिकेतदमृतस्य गोपा अवश्चरन्परो अन्येन पश्यन्.. (३) वैश्वानर अग्नि ही ताने-बाने को जानते हैं एवं समय-समय पर कहने योग्य बातें कहते हैं. जल के रक्षक एवं भूलोक में विचरण करने वाले अग्नि सूर्यरूप से सबको देखते हुए जगत् को जानते हैं. (३) अयं होता प्रथमः पश्यतेममिदं ज्योतिरमृतं मर्त्येषु. अयं स जज्ञे ध्रुव आ निषत्तोऽमर्त्यस्तन्वा३ वर्धमानः.. (४) हे मनुष्यो! वैश्वानर अग्नि सबसे पहले होता हैं. इन्हें देखो. ये मरणधर्मा मानवों में जठराग्निरूप से मरणरहित हैं. ये अग्नि ध्रुव, व्यापक, अविनाशी, शरीरधारी एवं बढ़ने वाले जाने जाते हैं. (४) ebook converter DEMO Watermarks*