भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

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दश रथान्प्रष्टिमतः शतं गा अथर्वभ्यः. अश्वथः पायवेऽदात्.. (२४) अश्वत्थ ने वायु को घोड़ों सहित दस रथ एवं अथर्व गोत्र वाले ऋषियों को सौ गाएं दी थीं. (२४) महि राधे विश्वजन्यं दधानान्. भरद्वाजान्तसार्ज्यो अभ्ययष्ट.. (२५) सबकी भलाई के लिए महान् धन धारण करने वाले भरद्वाजगोत्रीय ऋषियों की सृंजयपुत्र पुस्तोक ने पूजा की थी. (२५) वनस्पते वीड्वङ्गो हि भूया अस्मत्सखा प्रतरणः सुवीरः. गोभिः सन्नद्धो असि वीळयस्वास्थाता ते जयतु जेत्वानि.. (२६) हे काष्ठ द्वारा निर्मित रथ! तुम दृढ़ अवयवों वाले बनो. तुम हमारे मित्र उन्नतिकारक एवं शोभन वीरों से युक्त बनो. तुम गोचर्म से बंधे हो, हमें दृढ़ बनाओ. तुम्हारा भरोसा करने वाले रथी वीर शत्रुओं को जीतें. (२६) दिवस्पृथिव्याः पर्योज उद्भुतं वनस्पतिभ्यः पर्याभृतं सहः. अपामोज्मानं परि गोभिरावृतमिन्द्रस्य वज्रं हविषा रथं यज.. (२७) हे अध्वर्युगण! स्वर्ग एवं धरती पर साररूप अंश से बने हुए, वनस्पति के दृढ़ अंश से निर्मित, जल की गति से युक्त, गाय के चमड़े से ढके हुए एवं इंद्र के वज्र के समान रथ को लक्ष्य करके यज्ञ करो. (२७) इन्द्रस्य वज्रो मरुतामनीकं मित्रस्य गर्भो वरुणस्य नाभिः. सेमां ना हव्यदातिं जुषाणो देव रथ प्रति हव्या गृभाय.. (२८) हे दिव्य रथ! तुम इंद्र के वज्र, मरुतों के आगे चलने वाले, मित्र के गर्भ एवं वरुण की नाभि हो. इस यज्ञ में तुम यज्ञक्रिया देखते हुए हव्य स्वीकार करो. (२८) उप श्वासय पृथिवीमुत द्यां पुरुत्रा ते मनुतां विष्ठितं जगत्. स दुन्दुभे सजूरिन्द्रेण देवैर्दूराद्दवीयो अप सेध शत्रून्.. (२९) हे दुंदुभि! धरती और आकाश को शब्दपूर्ण कर दो. चर और अचर प्राणी तुम्हारे शब्द को जान लें. तुम इंद्र तथा अन्य देवों के साथ मिलकर हमारे शत्रुओं को बहुत दूर भगाओ. (२९) आ क्रन्दय बलमोजो न आ धा निः ष्टनिहि सुरिता बाधमानः. अप प्रोथ दुन्दुभे दुच्छुना इत इन्द्रस्य मुष्टिरसि वीळयस्व.. (३०) हे दुंदुभि! हमारे शत्रुओं को रुलाओ एवं हमें ओज तथा बल दो. तुम शत्रुओं को बाधा ebook converter DEMO Watermarks*