भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 987, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 987

वाले शत्रु को हमसे दूर करो एवं हमें सुख दो. (१३) ग्रावाणः सोम नो हि कं सखित्वनाय वावशुः. जही न्यत्रिणं पणिं वृको हि षः.. (१४) हे सोम! हमारे पत्थर तुम्हारी मित्रता की अभिलाषा करते हैं. तुम अधिक खाने वाले पणि को मारो. वह निश्चय ही बुरा है. (१४) यूयं हि ष्ठा सुदानव इन्द्रज्येष्ठा अभिद्यवः. कर्ता नो अध्वन्ना सुगं गोपा अमा.. (१५) हे इंद्र-प्रमुख देवो! तुम शोभन-दान वाले एवं दीप्तिसंपन्न हो. हमारे मार्गों को सुरक्षित बनाओ एवं सुख दो. (१५) अपि पन्थामगन्महि स्वस्तिगामनेहसम्. येन विश्वाः परि द्विषो वृणक्ति विन्दते वसु.. (१६) हम उस सुगम एवं पापरहित मार्ग को पा गए हैं, जिस पर चलने से सभी शत्रु नष्ट होते हैं और धन प्राप्त होता है. (१६) सूक्त—५२ देवता—विश्वेदेव न तद्दिवा न पृथिव्यानु मन्ये न यज्ञेन नोत शमीभिरभिः. उब्जन्तु तं सुभ्व१ः पर्वतासो नि हीयतामतियाजस्य यष्टा.. (१) मैं इस यज्ञ को स्वर्ग एवं धरती के देवों के योग्य नहीं मानता. मैं इसे अपने द्वारा अथवा अन्यों द्वारा संपादित यज्ञों के समान भी नहीं समझता. अतियाज के ऋत्विज् अत्यंतहीन बनें एवं सब पर्वत उसे पीड़ा पहुंचावें. (१) अति वा यो मरुतो मन्यते नो ब्रह्म वा यः क्रियमाणं निनित्सात्. तपूंषि तस्मै वृजिनानि सन्तु ब्रह्माद्विषमभि तं शोचतु द्यौः.. (२) हे मरुतो! जो व्यक्ति स्वयं को हमसे श्रेष्ठ मानता है अथवा हमारे द्वारा की हुई स्तुति की निंदा करता है, सारे तेज उसके बाधक हों तथा स्वर्ग उस यज्ञविरोधी को जलावे. (२) किमङ्ग त्वा ब्रह्मणः सोम गोपां किमङ्ग त्वाहुरभिशस्तिपां नः. किमङ्ग नः पश्यसि निद्यमानान् ब्रह्मद्विषे तपूंषि हेतिमस्य.. (३) हे सोम! ऋषिगण तुम्हें मंत्ररक्षक एवं निंदा से उद्धार करने वाला क्यों कहते हैं? तुम शत्रुओं द्वारा हमारी निंदा क्यों देखते रहते हो? उन ब्राह्मण विरोधियों के ऊपर तुम अपना ebook converter DEMO Watermarks*