रोगों की पहचान
Rogon Ki Pehchaan
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Jammu (उद्गम)
124
साहिब बन्दगी
भक्ति को कबीर साहिब जी ने
तीन भागों में बाँटा
सगुण भक्ति, निर्गुण भक्ति, परा भक्ति सगुण भक्ति करे संसारा। निर्गुण योगेश्वर अनुसारा॥ इन दोनों के पार बताया। मेरो चित्त एको नहीं आया॥ आपने इन दोनों के पार बताया। दादू दयाल जी ने कहा-
कोई सगुण में रीझ रहा, कोई निर्गुण ठहराय। अटपट चाल कबीर की, मौसे कही न जाय॥
जाप मरे अजपा मरे, अनहद भी मर जाय। सुरति समानी शब्द में, उसको काल न खाय॥
अंदर धुनें हैं। कुछ इसे सुरति शब्द अभ्यास भी कह रहे हैं और उनमें खो जाते हैं। कुछ धुनों को ही परमात्मा कह रहे हैं। पर इससे तुरीयातीत की अवस्था से पार नहीं जा सकते हैं। सबका अपना वजूद है। धुनें खत्म हो जाती हैं। फिर यह कौन-सा शब्द हुआ! यानी धुनात्मक शब्द भी नहीं है, वर्णनात्मक शब्द भी नहीं है। साहिब कह रहे हैं- 'सो तो शब्द विदेह॥' आवाज रहित धुन (Sound less sound) है वो, क्योंकि - 'दो बिन होय न अधर अवाजा॥' आवाज दो के बिना नहीं होती और जहाँ आवाज है, वहाँ माया है।
हद टप्पे सो औलिया, बे-हद टप्पे सो पीर। हद-बेहद दोनों टप्पे, तिसका नाम कबीर॥
रोगों की पहचान
125
अमर लोक का विदेह नाम
काया नाम सबहिं गुण गावै, विदेह नाम कोई बिरला पावै ॥ विदेह नाम पावेगा सोई, जिसका सदगुरु साँचा होई ॥
पाँच तीन यह साज पसारा, न्यारा शब्द विदेही हो। पाँच कहो तो छटवें हम हैं, आठ कहो नौ आई हो ॥
पाँच तीन अधीन काया, न्यार शब्द विदेह हो। सुरति माहिं विदेह दरशै, गुरु मता निज एह हो ॥
छिन इक ध्यान विदेह समाई। ताकी महिमा बरनिन न जाई ॥ सार नाम सदगुरु से पावे। नाम डोर गहि लोक सिधावे ॥ सार शब्द विदेह स्वरूपा। निःअक्षर वह रूप अनुपा ॥ तत्व प्रकृति भाव सब देहा। सार शब्द निःतत्व विदेहा ॥
बावन अक्षर में संसारा। निःअक्षर सो लोक पसारा ॥ सोई नाम है अक्षर बासा। काया ते बाहर परकासा ॥
शब्द शब्द सब कोई कहे, वह तो शब्द विदेह। जिभ्या पर आवे नहीं, निरख परख के लेह ॥
—साहिब कबीर जी
पिण्ड ब्रह्माण्ड और वेद कितेबै, पाँच तत्त्व के पारा। सतलोक यहाँ पुरुष विदेही, वह साहिब करतारा ॥
—दादू दयाल
आरती
आरति करहुँ संत सदगुरु की, सदगुरु सत्यनाम दिनकर की। काम, क्रोध मद, लोभ नसावन, मोह रहित करि सुरसरि पावन। हरहिं पाप कलिमल की, आरति करहुँ संत सदगुरु की ॥ सदगुरु सत्यनाम.....
तुम पारस संगति पारस तब, कलिमल ग्रसित लौह प्राणी भव। कंचन करहिं सुधर की, आरति करहुँ संत सदगुरु की ॥ सदगुरु सत्यनाम.....
भुलेहुँ जो जिव संगति आवें, कर्म भर्म तेहि बाँधि न पावें। भय न रहे यम घर की, आरति करहुँ संत सदगुरु की ॥ सदगुरु सत्यनाम.....
योग अग्नि प्रगटहि तिनके घट, गगन चढ़े श्रुति खुले वज्रपट। दर्शन हों हरिहर की, आरति करहुँ संत सदगुरु की ॥ सदगुरु सत्यनाम.....
सहस्र कैवल चढ़ि त्रिकुटी आवें, शून्य शिखर चढ़ि बीन बजावें। खुले द्वार सतघर की, आरति करहुँ संत सदगुरु की ॥ सदगुरु सत्यनाम.....
अलख अगम का दर्शन पावें, पुरुष अनामी जाय समावें। सदगुरु देव अमर की, आरति करहुँ संत सदगुरु की ॥ सदगुरु सत्यनाम.....
एक आस विश्वास तुम्हारा, पड़ा द्वार मैं सब विधि हारा। जय, जय, जय गुरुवर की, आरति करहुँ संत सदगुरु की ॥ सदगुरु सत्यनाम.....
126
आरती
जय सदगुरु देवा, स्वामी जय सदगुरु देवा, सब कुछ तुम पर अर्पण करहूँ पद सेवा।
जय गुरुदेव दया निधि, दीनन हितकारी, स्वामी भक्तन हितकारी, जय जय मोह विनाशक, जय जय तिमिर विनाशक, भय भंजन हारी। साहिब जय.....
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, गुरु मूर्ति धारी, स्वामी प्रभु मूर्ति धारी, वेद पुराण बखानत, शास्त्र पुराण बखानत, गुरु महिमा भारी। साहिब जय.....
जप तप तीर्थ संयम, दान विधि दीन्हे, स्वामी दान बहुत दीन्हे, गुरु बिन ज्ञान न होवे, दाता बिन ज्ञान न होवे, कोटि यत्न कीन्हे। साहिब जय.....
माया मोह नदी जल, जीव बहे सारे, स्वामी जीव बहे सारे, नाम जहाज बिठाकर, शब्द जहाज चढ़ाकर, गुरु पल में तारे। साहिब जय.....
काम क्रोध, मद, लोभ, चोर बड़े भारी, स्वामी चोर बहुत भारी, ज्ञान खड़ग दे कर में, शब्द खड़ग देकर में, गुरु सब संहारे। साहिब जय.....
नाना पंथ जगत में निज-निज गुण गावें, स्वामी न्यारे-न्यारे यश गावें, सब का सार बताकर, सब का भेद लखा कर, गुरु मार्ग लावें। साहिब जय.....
गुरु चरणामृत निर्मल, सब पातक हारी, स्वामी सब दोषक हारी, वचन सुनत तम नासे, शब्द सुनत भ्रम नासे, सब संशय टारी। साहिब जय.....
तन, मन, धन सब अर्पण, गुरु चरण कीजै, स्वामी दाता अर्पण कीजै, सदगुरु देव परमपद, सदगुरु देव अचलपद, मोक्ष गती लीजै। साहिब जय.....
127
पुस्तक सूची
हिन्दी में
- 1. परा रहस्या
- 2. मासिक पत्रिका सत्यकेतु
- 3. पावन प्रार्थनाएं
- 4. सदगुरु चालीसा
- 5. वार्षिक डायरी
- 6. सदगुरु भक्ति
- 7. कहाँ से तू आया और कहाँ तूझे जाना रे ?
- 8. सत्संग सुधा रस
- 9. नाम अमृत सागर
- 10. अमृत वाणी
- 11. सदगुरु नाम जहाज हैं
- 12. चल हंसा सतलोक
- 13. कोटि नाम संसार में तिनते मुक्ति न होय।
- 14. मूल नाम गुप्त है, जाने बिरला कोय ॥
- 15. गुरु सुमित्रे सो पार
- 16. तीन लोक से न्यारा
- 17. सेहत के लिए जरूरी
- 18. सहजे सहज पाइये
- 19. रोगों से छुटकारा
- 20. सदगुरु महिमा
- 21. भक्ति के चोर
- 22. अनुरागसागर वाणी
- 23. भक्ति सागर
- 24. हरि सेवा युग चार है, गुरु सेवा पल एक
- 25. सत्य नाम के सुमरते उबरे पतित अनेक
- 26. काग पलट हंसा कर दीना
- 27. कस्तूरी कुण्डल बसै मृग खोजे बन माहि
- 28. गुरु पारस गुरु परस है
- 29. गुरु अमृत की खान
- 30. शीश दिये जो गुरु मिले तो भी सस्ता जान
- 31. मूल सुरति
- 32. भृंग मता होय जिहि पास, सो गुरु सत्य धर्मदासा ॥
- 33. मैं कहता हूँ आँखिन देखी
- 34. गुरु संजीवन नाम बतावे
- 35. नाम बिना नर भटक मरे
- 36. रोगों की पहचान
- 37. यह संसार काल का देश
128