रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)
Rudrayamala Tantra (Uttara Tantra) with Hindi Commentary
भगवान भैरव / पं. रामचरण शर्मा द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दीटीकासहितम् ९ इस मंत्रको पहिले हजार वार पढ़कर फिर औषधियोंकी वटी बनाकर जिसका नाम ले तिलक करे तो वह राजा वश होय॥३२॥३३॥ घृतं दुग्धं शर्करां च दधिमधुकमेव च ॥ कमलपुष्पपत्राणि शतानि च विशेषतः ॥ रात्रौ च हवनं कुर्याच्चक्रवर्तीवशो भवेत् ॥ ३४ ॥ घृत दुग्ध शक्कर दही सहत कमलपुष्पके पत्र १०० रात्रिको हवन करे तो चक्रवर्ती वश होय ॥३४॥ गोभीं मयूरशिखां च मुखे वा शिरसि क्षिपेत् ॥ वादे चैव तथा वेदे जयमाप्नोति मानवः ॥ ३५ ॥ गोभी मयूरशिखा मुखमें वा शिरमें रखे तो वादमें वा वेदमें जय पावे ॥३५॥ मार्गशीर्षस्य पूर्णायां मूलमुद्धृत्ययत्नतः ॥ मयूरपिच्छस्य बध्नीयाद्धस्ते वा मस्तके तथा ॥ तदा वादेषु सर्वेषु जयमाप्नोति नित्यशः ॥ ३६ ॥ अगहनीपूनौको मोरशिखाकी जड़ यत्नसे उखाड़ हाथमें वा मस्तकमें बांधे तो सबवादोंमें जय पावे ॥३६॥ मंत्रः । ॐ नमः कनर्कापगे रौद्रकृपातरु- ष्टास्त्रधरनी तिष्ठ सरासरसत्वानं मोहये भगवतीसिधिधुजो इति मीठमहामाये स्वाहा ॥ अष्टोत्तरशतं जप्त्वा तदा सिद्ध्यतिमंत्रराट् ॥ ३७ ॥ यह मंत्र एक सौ आठ वार जपे तो मंत्र सिद्ध होय ॥३७॥ २