भारतकोश
रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)

रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)

Rudrayamala Tantra (Uttara Tantra) with Hindi Commentary

भगवान भैरव / पं. रामचरण शर्मा द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished68 पृष्ठ

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८ रुद्रयामलतन्त्रम् मुस्तामूलको चंदनमें मिलाकर तिलक करे तो जो देखे सो नर वा स्त्री वश्य होय ॥२७॥ मंत्रः । ॐ वज्रकरण शिवे रुध रुध भवे ममाई अमृत कुरु कुरु स्वाहा । सहस्रैकं जपेन्मंत्रं पश्चाच्च गृह्णात्यौषधीम् ॥ तदा सिद्धिर्भवेत्तस्य नान्यथा सिद्धिरुच्यते ॥ २८ ॥ इस मंत्रको हजार वार जपे पीछेसे औषध ले तो सिद्ध होय और तर- हसे सिद्धि नहीं कही है ॥२८॥ उच्छिष्टचांडालीप्रयोगः । एकांते भोजनं चैव कुंकुमादिसमन्वितम् ॥ केशरं चंदनं चैव गोरोचनमथापि च ॥ २९ ॥ गोदुग्धेन समाश्लिष्य कर्पूरेण समन्वितः ॥ एषां तिलकमात्रेण नृपो वश्यो भवेत्तदा ॥ ३० ॥ एकांतमें भोजन करे, कुंकुम, केशर, गोरोचन, चंदन, कर्पूर, गोदुग्धमें मलाकर तिलक करे तो राजा वश्य होय ॥२९॥३०॥ मंत्रः । उच्छिष्टेच्छिष्टा चांडाली सती वाकं कुरु मंत्रय स्वाहा॥ मंत्रणानेन चाश्लेष्य चौषधीं च विशेषतः ॥३१॥ इस मंत्रसे औषधि अभिमंत्रित करे तब सिद्ध होय ॥३१॥ मंत्रः । ॐ ह्रीं अमुकं मे वश्यं कुरु कुरु स्वाहा । मंत्रेदं तु सहस्रैकं जप्त्वा पूर्वं समाहितः ॥ ३२ ॥ वटीं बध्नात्यौषधीनां वदत्यन्यस्य नामक्रम् ॥ जलेन तिलकं कृत्वा तदा वश्यो भवेन्नृपः ॥ ३३ ॥