रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)
Rudrayamala Tantra (Uttara Tantra) with Hindi Commentary
भगवान भैरव / पं. रामचरण शर्मा द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दीटीकासहितम् ७ अन्यप्रयोगः । क१/२१४ श्वेतशरपुंखमूलं पेषयेच्च जलेन वै ।। चंद्रस्य ग्रहणे चैव समुद्धृत्य विधानतः ।। २२ ।। चंद्रके ग्रहणमें विधानसे सफेद सरपुंखाकी जड लाकर जलके संग पीसे ।।२२।। नेत्रे चैवांजनं कुर्यात्सर्वथा विधिना तथा ।। जगत्त्रयं तदा वश्यं राजानश्च प्रजास्तथा ।। २३ ।। और नेत्रोंमें अंजन करे तो तीन लोकमें राजा प्रजा वश्य होय ।।२३। मुस्तामूलं समादाय मुखे संस्थाप्य यत्नतः ।। यस्य नाम च संब्रूयात्सोऽपि वश्यो भवेत्तदा ।। २४ ।। मुस्ताकी जड मुखमें रख जिसका नाम लेय सो वश्य होय ।।२४।। मनःसिलं गोरोचनं मुस्तामूलं जलेन वा ।। तिलकं कारयेद्योपि नाम ब्रूयाद्यथा हि सः ।। २५ ।। मनसिल, गोरोचन, मुस्ताकी जड़ जलमें पीस तिलक कर जिसका नाम ले सो वश्य होय ।।२५।। मुस्तामूलं सुवर्णेन बध्नाति दक्षिणे करे ।। तदा प्राणसुखी भूयात् धनं च बहुधा भवेत् ।। २६ ।। मुस्ताकी जड सुवर्णमें मढाय दक्षिण हाथ में बांधे तो प्राण सुखी रहे तथा बहुत प्रकारका धन होय ।।२६।। मुस्तामूलं चंदनेन तिलकं च विधानतः ।। कृत्वा तस्य दर्शनाच्च वशीभूतो नरोथवा ।। २७ ।।