रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)
Rudrayamala Tantra (Uttara Tantra) with Hindi Commentary
भगवान भैरव / पं. रामचरण शर्मा द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंरुद्रयामलतन्त्रम् चूर्णयित्वा च यं चैव तांबूलेनैव खादयेत् ।। सोऽपि वश्यो भवेत्सद्यो भगवत्याः प्रसादतः ।। १६ ।। चूर्ण कर तांबूलमें खवावे तो भगवतीके प्रसादसे वश्य होय ॥१६॥ स्नानं कृत्वा तु यत्नेन यस्योपरि च क्षिपेत् ।। गोरोचनेन संयुक्तां सहदेवीं जलेन व ।। १७ ।। तिलकं कृत्वा तु भाले वशीभूतास्तथापि च ।। सहदेवीचूर्णकं च मस्तके यस्य निक्षिपेत् ।। सोपि वश्यो भवेत्सद्यो नात्र कार्या विचारणा ।। १८ ।। स्नान कर जिसके ऊपर छोड देय सो वश्य होय । गोरोचन सहदेवी जलमें मिलाकर मस्तकमें तिलक करे और जिसके सामने जाय तो वश्य होय वा सहदेवीका चूर्ण मस्तकपर छोड़ देय तो शीघ्रही वह वश होय इसमें संशय नहीं ॥१७॥१८॥ सहदेव्याश्च मूलं च मुखे निक्षिप्य यत्नतः ॥ १९ ॥ सहदेवीका मूल यत्नसे मुखमें राखे तो वश्य होय ॥१९॥ कुमारीनिर्मिते सूत्रे मूलं संबध्य यत्नतः ॥ स्त्रियाः कट्यां च बंधेत तदा भोग्यवती भवेत् ।। २० ।। कुमारीके काते सूत्रमें मूल बांध स्त्रीके कटिमें बांधे तो स्त्री भोगके योग्य होय और वश्य होय ॥२०॥ मंत्रः ॥ ॐ नमो भगवती मंगलेश्वरी- सुखरालिनी सर्वधरंमातंगी कुमारीक लघु लघु वलं कुरु कुरु स्वाहा। सहस्रं च जपेन्मंत्रं तदा सिद्धिर्भविष्यति ।। २१ ।। इस मंत्रको १००० पहिले जपे तो सिद्धि होय ॥२१॥