रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)
Rudrayamala Tantra (Uttara Tantra) with Hindi Commentary
भगवान भैरव / पं. रामचरण शर्मा द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दीटीकासहितम् ५ रक्तचंदनपानीयं तेनैव नाम वै लिखेत् ॥ सोपि वश्यो भवेत्सद्यो नात्र कार्याविचारणा ॥ १० ॥ बकरीके मूत्रमें पीस वटी बनाके छायामें सुखावे और रक्तचंदनके पानीसे घिस नाम लिखे सो वश होय इसमें कुछ विचार नहीं है ॥१०॥ देवदारुं चंदनं च वटिकां च तथैव च ॥ ११ ॥ जलेन पेष्य पंचैव खादयेत्सुमाहितः ॥ सोऽपि वश्यो भवत्येव महादेव प्रसादतः ॥ १२ ॥ देवदारु सफेद चंदन और वटी जलमें पीस खवावे तो वह महादेवके प्रसादसे वश्य होय ॥११॥१२॥ पुनर्वटीं समादाय गोरोचनसमन्विताम् ॥ जलेन तिलकं कृत्वा यत्र गच्छति सिद्धिदः ॥ १३ ॥ फिर वटी और गोरोचन जलमें मिलाकर तिलक करे तो जहां जाय तहां सिद्धि होय ॥१३॥ मंत्रः । ॐ नमः सर्वार्थसाधनी स्वाहा । मंत्रेदं प्रथमं जप्त्वा सहस्रवारकम् ॥ कार्यसिद्धिकरं चैव सर्वथा सिद्धिकारकम् ॥ १४ ॥ इस मंत्रको १००० जपे तो कार्यसिद्धि होय ॥१४॥ अन्यप्रयोगः कृष्णपक्षस्य चाष्टम्यं चतुर्दश्यामुपोष्य वै ॥ र्बलि दत्त्वा च चौद्धृत्य सहदेवी समाहितः ॥ १५ ॥ कृष्णपक्षकी अष्टमी वा चतुर्दशीका व्रत कर सहदेईको उखाडे ॥१५॥