रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)
Rudrayamala Tantra (Uttara Tantra) with Hindi Commentary
भगवान भैरव / पं. रामचरण शर्मा द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४ रुद्रयामलतन्त्रम् पुष्यनक्षत्रमें यथसंगाकी मूल रुद्रवंती जवकी मूल ले कुमारीके काते सूतमें पुरुषके दहिने स्त्रीके बांये हाथमें बांधे तो सब वशीभूत होंय इसमें संदेह नहीं है ॥४॥५॥ मंत्रः। ॐयँपरक्षोभयंभगवती गंभीर रेछ स्वाहा ॥ अंधझारस्य मूलं च गोरोचनसमन्वितम् ॥ जलेन पेषयेच्चैव तिलकं कारयेद्बुधः ॥ त्रैलोक्यं च वशीभूतं नात्र कार्याविचारणा ॥ ६ ॥ इस मंत्रका २०००० जप करे । आंधे झारकीमूल गोरोचन मिलाय कर पानीमें पीसकर तिलक करे तो तीन लोक वश होंय इसमें विचार न करना ॥६॥ मंत्रः ॐ नमो नमो कदसंवारीनि सर्वलोकवश्यकरी स्वाहा ॥ अष्टोत्तरशतं चैव जपेन्मंत्रं समाहितः ॥ मंत्रसिद्धिस्तदा यातः सर्ववश्यकरः परः ॥ ७ ॥ इस मंत्रका १०८ जप करे तो मंत्रसिद्धि होती है, सब वश्य होते हैं ॥७॥ शनैश्चरोपवासं च कृत्वा च विधिपूर्वकम् ॥ उत्तराभिमुखो भूत्वा चोद्धृत्य च शुचि तरुम् ॥ ८ ॥ शनिका व्रत कर विधिसे उत्तरमुख बैठके इंद्रायनको उखाडे ॥८॥ पंचांगु च समानीय च्छायाशुष्कं तु कारयेत् ॥ पिष्ट्वा शुंठीं पिप्पलीं च मरिचं च समानयेत् ॥ ९ ॥ पंचांग ले छायामें सुखाके पीसकर सोंठ पिप्पली मिरच मिलाकर ॥९। अजामूत्रेण संपेष्य छायाशुष्कां वटीं न्यसेत् ॥