रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)
Rudrayamala Tantra (Uttara Tantra) with Hindi Commentary
भगवान भैरव / पं. रामचरण शर्मा द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१२ रुद्रयामलतन्त्रम् रात्रिको अपना वीर्य हाथमें रखे और वाम अंगुलीसे स्त्रीके अंगुठेमे लगा दे तो सो वश्य होय ॥४६॥ इज्यर्क्षे च गृहीत्वैव कृष्णतूमरकीलकम् ॥ रविवारे स्पृशेदयां वै सा वशीभूता न संशयः ॥ वंध्या स्त्री सप्तरात्रेण वश्यं याता न संशयः ॥ ४७ ॥ पुष्यनक्षत्रमें कृष्ण धतूरेकी कील रविवारको जिसको छुवा दे सो वश्य होय । वंध्या स्त्री भी सात रात्रिमें वश होती है ॥४७॥ मंत्रः । ॐ चिमिचिमि स्वाहा ॥ उत्थाय प्रातरेव सुमुखं संमार्जयेच्च ॥ सप्त सप्त च चुलुकां मंत्रितां च पिबेदपः ॥ यस्या नाम ब्रुवेच्चैव वशीभूता न संशयः ॥ ४८ ॥ यह मंत्रपढ़ प्रातःकाल उठ अपना मुख धोवे और सात चुल्लू पानी अभि- मंत्रित करके जिसका नाम लेके पीवे वह वश्य होय ॥१८॥ ॐ नमः छिप्राकामिनी अमुर्की मे वशमानय स्वाहा ॥ॐ नागकेशरकं चैव कमलपुष्पं तथैव च ॥ तगरं केशरं चैव जटामासीं वचं तथा ॥ ४९ ॥ यह मंत्र पढ़कर नागकेशर कमलफल तगर केशर जटामासी वच ॥४९॥ समभागे चूर्णयित्वा धूपयेदंगमुत्तमम् ॥ मनसा वा स्मरेद्यां वै सापि वश्या न संशयः ॥५० ॥ बराबर ले चूर्ण कर अपने अंगमें धूप दे मनमें जिस स्त्रीका स्मरण करे सो वश होय इसमें संशय नहीं ॥५०॥