भारतकोश
रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)

रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)

Rudrayamala Tantra (Uttara Tantra) with Hindi Commentary

भगवान भैरव / पं. रामचरण शर्मा द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished68 पृष्ठ

पृष्ठ 21, कुल 68 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 21

हिन्दीटीकासहितम् १९ ताल वृक्षकी जड़ मूंडमें और खजूरकी जड़ वाम पादमें होय तौ खङ्गसे न कटे ॥८२॥ मूलत्रयं समादाय गोघृतेन समन्वितम् ।। पिबेद्योपि नरो तं वै नास्त्राणि विव्यधेच्च तम् ।। ८३ ।। तीनों जड़ें लेकर गोघृतमे मिलाकर पीबे तो अस्त्र न वेधे ॥८३॥ मंत्रः । अहो कुंभकरणमहाराक्षसवेषसांगीव संभूतपरसैन्यभंजनं महाभगवानरुद्रोग्या- ययांती स्वाहा । मंत्रमेतं जपेद्वारमष्टोत्तर- शतं तथा ।। तदा सिद्धिर्हि जायेत महा- देवप्रसादतः ॥ ८४ ॥ यह मंत्र अष्टोत्तर वार जपे तौ महादेवके प्रसादसे सिद्धि होय ॥८४॥ पुष्यार्के तु समादाय शिरीषस्य च मूलकम् ।। जलेन तिलकं कृत्वा तप्तलोहे न दह्यते ॥ ८५ ।। पुष्यार्कमें शिरसकी जड़ ले जलमें पीस तिलक करे तो ताते लोहेमें न जले ॥८५॥ सर्पो यदा दशति च तिलकं कारयेत्तदा ।। निर्विषश्च भवेच्छीघ्रं नात्र कार्याविचारणा ।। ८६ ।। जो सांप काटे तो तिलक करे तो विष न चढ़े इसमें विचार नहीं करना ॥८६॥ श्वेतगुंजाश्वगंधयोश्च मूलं चोत्तरभाद्रके ।। चोत्तराभिमुखो भूत्वा न दहेन्मूर्ध्नि धारणे ॥ ८७।। श्वेत गुंजाकी जड़ और असगंधकी जड़ उत्तराभाद्रपदा नक्षत्रमें उत्तर मुख कर मूंडपर धरे तो अग्निमें न जरे ॥८७॥