रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)
Rudrayamala Tantra (Uttara Tantra) with Hindi Commentary
भगवान भैरव / पं. रामचरण शर्मा द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१८ रुद्रयामलतन्त्रम् मंत्रेणानेन तर्पयेदष्टोत्तरशतं च तम् । नामोच्चारणमात्रेण बुद्धिनाशो भवेद्रिपोः ॥ ७७ ॥ इस मंत्रसे शत्रु का नाम लेकर एक सौ आठ वार तर्पण करे तो रिपुकी बुद्धि नष्ट होय ॥७७॥ मंत्रः । ॐ नमो ब्रह्मवासिनी रछ रंछ ठः ठः स्वाहा । मंत्रेदं च पठित्वा तु सप्त केशान्समाहरेत् ॥ करे बध्नाति त्रयं च द्वौ द्वौ हस्ते समानयेत् ॥ चौरकार्ये तदा यातः न वदंति च केचन ॥ ७८ ॥ मंत्र पढ़कर सात बाल उखाड़े तीन हाथमें बांधे, दो दो बाल हाथमें रखे और चोरीको जाय तो कोई न बोले ॥७८॥ अंकोललक्ष्मणामूलं शरपुंखकमेवच ॥ ७९ ॥ मयूरपिच्छस्य मूलं छिर्हंटामूलमेवच ॥ बृहद्दद्रुघ्नमूलं च पुष्यार्के तु समानयेत् ॥ ८० ॥ अंकोलकी जड़, लक्ष्मणाकी जड़, सरफोकाकी जड़, मयूरशिखाकी जड़, छिर्हंटाकी जड़ और कसौंदीकी जड़ पुष्यार्कमें लेकर ॥७९॥८०॥ गृहे स्थितेऽपि न भयं राजतश्चोरतोऽपि च ॥ गृहीत्वा केतकीमूलं शिरसि धारयेच्च यः ॥ ८१ ॥ गृहमे रखे तो चोरादिकोंका भय नहीं होय तथा केतकीकी जड़ शिरमें रखे तो भी भय नहीं होय ॥८१॥ तालवृक्षस्य मूलं च मूर्ध्नि धारणमात्रतः ॥ पादे खर्जूरमूलं च खङ्गो न छिद्यते तदा ॥ ८२ ॥