रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)
Rudrayamala Tantra (Uttara Tantra) with Hindi Commentary
भगवान भैरव / पं. रामचरण शर्मा द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दीटीकासहितम् १७ भस्म समानीय तदा समीपे प्रेरणात्तथा ॥ प्रक्षेपयेन्मंत्रयुतं वश्यं याति विशेषतः ॥ ७२ ॥ भस्म ले मंत्र पढ़ नाम ले और मंत्रसमेत भस्म शिरपर छोड़ दे तो विशेष- तासे वश्य होय ॥७२॥ स्तंभनम् । हरिद्रा हरतालं च जलेन समन्वितम् । भूर्जपत्रे लिखेद्यंत्रं हरित्सूत्रेणवेष्टयेत् ॥ बंधयेत्स्त्रीमूर्ध्नि तं वै न वदेत्सह केन सा ॥ ७३ ॥ हरदी हलताळको जलमें पीसकर भोजपत्रपर यंत्र लिखे और हरे सूत्रसे लपेटे और स्त्रीके मूडमें बांधे तो वह किसीके संग न बोले ॥७३॥ उष्ट्रस्यास्थि समादाय खनित्वा भू निधापयेत् ॥ अतिशीघ्रचला चापि स्थिरीभूता न संशयः ॥ ७४ ? ॥ ऊंटके हाड़ले खोदके भूमिमें जिसका नाम लेकर गाड़े वह अतिशीघ्र चलनेवाली भी स्थिर होय ॥७४॥ घामरं ह्यंधझारं च सहदेवीं च सर्षपम् ॥ ७५ ॥ समभागं च तां कृत्वा तैलं निःसारयेत्तदा ॥ पातालयंत्रं तिलकं शत्रुबुद्धिं च नाशयेत् ॥ ७६ ॥ घामरा, अन्धझार, सहदेई, सरसों बराबर लेकर पातालयंत्रसे तेल काढ़ तिलक करे तो शत्रु की बुद्धि नष्ट होय ॥७५॥७६॥ मंत्रः । ॐ नमो भगवते विश्वामित्राय नमःस- र्वमुखीभ्यां विश्वामित्राज्ञामति आगच्छस्वाहा । ३