रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)
Rudrayamala Tantra (Uttara Tantra) with Hindi Commentary
भगवान भैरव / पं. रामचरण शर्मा द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१६ रुद्रयामलतन्त्रम् कौहा (अर्जुन) वृक्षका बांदा आश्लेषा नक्षत्रमें ले छेरीके मूत्रमें पीस- कर क्षेपण करे तो पुरुषके स्त्री और स्त्रीके पुरुष वश होय ।।६५।६६।। कृष्णसर्पस्य च फणां छित्त्वा चूर्ण समानयेत् ।। तं चापि धूपयेदंगे नाम गृह्णाति चेति तम् ।। ६७ ।। कृष्णसर्पकी फणा काटकर चूर्ण कर अंगमें धूप दे जिस स्त्रीका नाम ले सो उस पुरुषके समीप आवे ।।६७।। संध्यायां तु समादाय यस्याः पादतलाइ्रजः ।। वामानाम् समुच्चार्य लक्षमंत्रचतुष्टयम् ।। ६८ ।। संध्यामें स्त्रीके पादकी धूलि उठाकर वामानाम् ले चार लाख मंत्र जपे ।।६८।। मंत्रः । ह्रीं हूं अमुकी आकर्षय ।। जपे मंत्रे समायाति गृहं प्रति न संशयः ।। घुंघुरनाममंत्रं च जपित्वा पुष्पमाहरेत् ।। ६९ ।। चेटगस्य फलं चैव पूजयेच्च तदा निशि ।। ७० ।। यह मंत्र पूर्ण भये पर वह स्त्री गृहको चली आवे इसमें संदेह नहीं और घुंघुरनाम मंत्र जप कर चेटग वृक्षके फूल फल तोडे और रात्रिमें पूजन करे ।।६९।।७०।। मंत्रः । अरं घुघुराकृष्टकर्मकर्त्ता अमुकं करोवश्यं । भ्रामरौ स्थितौ चैकत्र वियोजयेद्विधानतः ।। पृथक्पृथक्समानीय चिताकाष्ठेन निर्दहेत् ।। ७१ ।। यह मंत्र पढ़ भ्रमर भ्रमरी जब इकट्ठे होंय तो उनको न्यारे कर चिताकी लकड़ीमें जलावे ।।७१।।