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रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)

Rudrayamala Tantra (Uttara Tantra) with Hindi Commentary

भगवान भैरव / पं. रामचरण शर्मा द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished68 पृष्ठ

१६ रुद्रयामलतन्त्रम् कौहा (अर्जुन) वृक्षका बांदा आश्लेषा नक्षत्रमें ले छेरीके मूत्रमें पीस- कर क्षेपण करे तो पुरुषके स्त्री और स्त्रीके पुरुष वश होय ।।६५।६६।। कृष्णसर्पस्य च फणां छित्त्वा चूर्ण समानयेत् ।। तं चापि धूपयेदंगे नाम गृह्णाति चेति तम् ।। ६७ ।। कृष्णसर्पकी फणा काटकर चूर्ण कर अंगमें धूप दे जिस स्त्रीका नाम ले सो उस पुरुषके समीप आवे ।।६७।। संध्यायां तु समादाय यस्याः पादतलाइ्रजः ।। वामानाम् समुच्चार्य लक्षमंत्रचतुष्टयम् ।। ६८ ।। संध्यामें स्त्रीके पादकी धूलि उठाकर वामानाम् ले चार लाख मंत्र जपे ।।६८।। मंत्रः । ह्रीं हूं अमुकी आकर्षय ।। जपे मंत्रे समायाति गृहं प्रति न संशयः ।। घुंघुरनाममंत्रं च जपित्वा पुष्पमाहरेत् ।। ६९ ।। चेटगस्य फलं चैव पूजयेच्च तदा निशि ।। ७० ।। यह मंत्र पूर्ण भये पर वह स्त्री गृहको चली आवे इसमें संदेह नहीं और घुंघुरनाम मंत्र जप कर चेटग वृक्षके फूल फल तोडे और रात्रिमें पूजन करे ।।६९।।७०।। मंत्रः । अरं घुघुराकृष्टकर्मकर्त्ता अमुकं करोवश्यं । भ्रामरौ स्थितौ चैकत्र वियोजयेद्विधानतः ।। पृथक्पृथक्समानीय चिताकाष्ठेन निर्दहेत् ।। ७१ ।। यह मंत्र पढ़ भ्रमर भ्रमरी जब इकट्ठे होंय तो उनको न्यारे कर चिताकी लकड़ीमें जलावे ।।७१।।

सूत्रसे लपेटे और स्त्रीके मूडमें बांधे तो वह किसीके संग न बोले ॥७३॥

हिन्दीटीकासहितम् १७ भस्म समानीय तदा समीपे प्रेरणात्तथा ॥ प्रक्षेपयेन्मंत्रयुतं वश्यं याति विशेषतः ॥ ७२ ॥ भस्म ले मंत्र पढ़ नाम ले और मंत्रसमेत भस्म शिरपर छोड़ दे तो विशेष- तासे वश्य होय ॥७२॥ स्तंभनम् । हरिद्रा हरतालं च जलेन समन्वितम् । भूर्जपत्रे लिखेद्यंत्रं हरित्सूत्रेणवेष्टयेत् ॥ बंधयेत्स्त्रीमूर्ध्नि तं वै न वदेत्सह केन सा ॥ ७३ ॥ हरदी हलताळको जलमें पीसकर भोजपत्रपर यंत्र लिखे और हरे सूत्रसे लपेटे और स्त्रीके मूडमें बांधे तो वह किसीके संग न बोले ॥७३॥ उष्ट्रस्यास्थि समादाय खनित्वा भू निधापयेत् ॥ अतिशीघ्रचला चापि स्थिरीभूता न संशयः ॥ ७४ ? ॥ ऊंटके हाड़ले खोदके भूमिमें जिसका नाम लेकर गाड़े वह अतिशीघ्र चलनेवाली भी स्थिर होय ॥७४॥ घामरं ह्यंधझारं च सहदेवीं च सर्षपम् ॥ ७५ ॥ समभागं च तां कृत्वा तैलं निःसारयेत्तदा ॥ पातालयंत्रं तिलकं शत्रुबुद्धिं च नाशयेत् ॥ ७६ ॥ घामरा, अन्धझार, सहदेई, सरसों बराबर लेकर पातालयंत्रसे तेल काढ़ तिलक करे तो शत्रु की बुद्धि नष्ट होय ॥७५॥७६॥ मंत्रः । ॐ नमो भगवते विश्वामित्राय नमःस- र्वमुखीभ्यां विश्वामित्राज्ञामति आगच्छस्वाहा । ३

१८ रुद्रयामलतन्त्रम् मंत्रेणानेन तर्पयेदष्टोत्तरशतं च तम् । नामोच्चारणमात्रेण बुद्धिनाशो भवेद्रिपोः ॥ ७७ ॥ इस मंत्रसे शत्रु का नाम लेकर एक सौ आठ वार तर्पण करे तो रिपुकी बुद्धि नष्ट होय ॥७७॥ मंत्रः । ॐ नमो ब्रह्मवासिनी रछ रंछ ठः ठः स्वाहा । मंत्रेदं च पठित्वा तु सप्त केशान्समाहरेत् ॥ करे बध्नाति त्रयं च द्वौ द्वौ हस्ते समानयेत् ॥ चौरकार्ये तदा यातः न वदंति च केचन ॥ ७८ ॥ मंत्र पढ़कर सात बाल उखाड़े तीन हाथमें बांधे, दो दो बाल हाथमें रखे और चोरीको जाय तो कोई न बोले ॥७८॥ अंकोललक्ष्मणामूलं शरपुंखकमेवच ॥ ७९ ॥ मयूरपिच्छस्य मूलं छिर्हंटामूलमेवच ॥ बृहद्दद्रुघ्नमूलं च पुष्यार्के तु समानयेत् ॥ ८० ॥ अंकोलकी जड़, लक्ष्मणाकी जड़, सरफोकाकी जड़, मयूरशिखाकी जड़, छिर्हंटाकी जड़ और कसौंदीकी जड़ पुष्यार्कमें लेकर ॥७९॥८०॥ गृहे स्थितेऽपि न भयं राजतश्चोरतोऽपि च ॥ गृहीत्वा केतकीमूलं शिरसि धारयेच्च यः ॥ ८१ ॥ गृहमे रखे तो चोरादिकोंका भय नहीं होय तथा केतकीकी जड़ शिरमें रखे तो भी भय नहीं होय ॥८१॥ तालवृक्षस्य मूलं च मूर्ध्नि धारणमात्रतः ॥ पादे खर्जूरमूलं च खङ्गो न छिद्यते तदा ॥ ८२ ॥

हिन्दीटीकासहितम् १९ ताल वृक्षकी जड़ मूंडमें और खजूरकी जड़ वाम पादमें होय तौ खङ्गसे न कटे ॥८२॥ मूलत्रयं समादाय गोघृतेन समन्वितम् ।। पिबेद्योपि नरो तं वै नास्त्राणि विव्यधेच्च तम् ।। ८३ ।। तीनों जड़ें लेकर गोघृतमे मिलाकर पीबे तो अस्त्र न वेधे ॥८३॥ मंत्रः । अहो कुंभकरणमहाराक्षसवेषसांगीव संभूतपरसैन्यभंजनं महाभगवानरुद्रोग्या- ययांती स्वाहा । मंत्रमेतं जपेद्वारमष्टोत्तर- शतं तथा ।। तदा सिद्धिर्हि जायेत महा- देवप्रसादतः ॥ ८४ ॥ यह मंत्र अष्टोत्तर वार जपे तौ महादेवके प्रसादसे सिद्धि होय ॥८४॥ पुष्यार्के तु समादाय शिरीषस्य च मूलकम् ।। जलेन तिलकं कृत्वा तप्तलोहे न दह्यते ॥ ८५ ।। पुष्यार्कमें शिरसकी जड़ ले जलमें पीस तिलक करे तो ताते लोहेमें न जले ॥८५॥ सर्पो यदा दशति च तिलकं कारयेत्तदा ।। निर्विषश्च भवेच्छीघ्रं नात्र कार्याविचारणा ।। ८६ ।। जो सांप काटे तो तिलक करे तो विष न चढ़े इसमें विचार नहीं करना ॥८६॥ श्वेतगुंजाश्वगंधयोश्च मूलं चोत्तरभाद्रके ।। चोत्तराभिमुखो भूत्वा न दहेन्मूर्ध्नि धारणे ॥ ८७।। श्वेत गुंजाकी जड़ और असगंधकी जड़ उत्तराभाद्रपदा नक्षत्रमें उत्तर मुख कर मूंडपर धरे तो अग्निमें न जरे ॥८७॥

२० रुद्रयामलतन्त्रम् पतजियाफलैकं च खादयेद्विषभोजिनम् ॥ विषं न स्पृशते तस्य देहे चैव सुखी भवेत् ॥ ८८ ॥ पतजियाका फल विषवालेको खवावे तो उसकी देहमें विष न व्यापे, सुखी होय ॥८८॥ विजयामूलमादाय गोरोचनघृतं तथा ॥ हस्तलेपेन तिलकं कृत्वा न दह्यते तदा ॥ ८९ ॥ भांगकी जड़ गोरोचन और घृतका हाथमें लेप कर तिलक करे तो न जरे ॥८९॥ मरिचं पिप्पली शुंठी चर्वयित्वा ग्रसेत् तान् ॥ अर्कतंडुलग्रासेन दिनाई च न स्पृशोत्तम् ॥ ९० ॥ मिर्च पीपल सोंठ इनको चवावे और अर्कके तंडुल चवावे तो दिनाइ न लगे ॥९०॥ शुंठी वचं घृतं चैव शर्करा च समन्वितम् ॥ जलेन च पिबेद्योपि तप्ततैले न दह्यते ॥ ९१ ॥ सोंठ वच घृत शक्करको जलके संग पीवे तो ताते तेलमें न जरे ॥९१॥ मंत्रः । ॐ अग्निदहंतीकौ धरै समह वहै कलाई तापिनी ताप चोरी इष्टि द्रव्यपते अस्तंभइ स्वरतुम सखीये ते अस्तंभ श्री- महादेवकी आग्या ॥ मंत्रेदं तु पठेद्योपि तप्ततैले न दह्यते ॥ मंत्रः ॐ लोहाजलन- प्रजलैकौभाव हो चरुवाके दारका लाहां

हिन्दीटीकासहितम् २१ परैतसारु ।। अग्निस्तंभनम् । ॐ ह्रौं महि षवाहिनी जेभय मोहय छेदय अग्निस्तंभय अग्नि अग्निस्तंभय ठः ठः श्रीमहादेवकी आग्या हनुमानकी आग्या नारायण सूर्यकी आग्या ।। मंत्रेदं दशसहस्रं जप्त्वा सिद्धिमवाप्नुयात् ।। ९२ ।। अग्नि रोकनेका मंत्र पढ़े तो तेलमें न जरे, दूसरा मंत्र दश हजार जपे तो सिद्धि होय ॥९२॥ मंत्रः । ॐ तता तता अंगरी हेमपथक्रीकि- वारी महिद्रसीशलं गोर महादेवकी आ- ग्या । ॐ नमो कंबल कोषिलनिद्रुपति काढ़ि जलेसलै पूर्वते कतारनु महादेवकी पूजा खाय पाय तेलै । ॐ अग्नि ववरतिको धरै मै धरौ गलहंथ्य वाम माया यौनकी- जो सो कीन्हो हंथ्य जलय प्रजलपदमयं- येय आवैजः महादेवकी पूजा पावै पाय- डालै जः । ॐ अग्नि जलतीमें धरि जहा हर दीन्हो हथ्यं वैमैस्वाद रथ भियौदै ना- रायण साखीश्रीसूर्यकी आग्या अग्निकुं- ड ब्रह्मांड जला ऊपर आनौ पानीरेला आनि वैस्वादर नाचौ मेरी आदिनाथके जभमरो जी महंमद । ॐ हंगुरुगतीसै लि-

२२ रुद्रयामलतन्त्रम् खतिकाकमहय्यंईंद्रगस्त्रिहवोरीति । अग्नि- मुक्तमंत्रेदं हि चाष्टोत्तरशतं जपेत् ।। तदा सिद्धो भवेच्चैव महादेवप्रसादतः ।। ९३ ।। यह अग्निमुक्त मंत्र एक सौ आठ वार जपे तो महादेवके प्रसादसे मंत्र सिद्ध होय ॥९३॥ गोरसं रनिना सार्द्धं पिष्ट्वा लेपं च कारयेत् ।। मनुष्यास्थौ तथा तं च वह्नौ तैले न निर्दहेत् ।। ९४ ।। गोरस और रनि पीसकर मनुष्यके हाड़में लेप करे तौ तेलमें वा अग्निमें न जरे ॥९४॥ मंत्रं जपेच्छनौ वारे बलिदानंसकुक्कुटम् ।। आदित्यवारे दद्याच्च मद्ये तन्मांसमुत्क्षिपेत् ।। ९५ ।। शनिवारको मंत्र जपे और कुक्कुटका बलिदान दे रविवारको उसका मांस मदिरामें छोड़े ॥९५॥ तन्मांसं खरलं कृत्वा वारिणा तिलकं चरेत् ।। अग्निममध्ये तदा गच्छेदग्निनैंव दहेच्च तम् ।। ९६ ।। वह मांस जलमें खरल कर तिलक करे और अग्निमें जाय तो न जले ॥९६॥ इयं बाक्सर्वजलेषु सिद्धमस्ति न संशयः ।। तुंबिलस्सोरयोर्बीजं पुष्पं वारिणि पिष्टयेत् ।। ९७ ।। यह वाणी सब जलमें सिद्ध है। तोंबीके बीज और लहसोरेकी बीज और फल जलमें पीस ॥९७॥

हिन्दीटीकासहितम २३ जले निक्षिप्य तं चैव रात्रौ स्तंभो भविष्यति ।। लवणक्षेपणाच्चैव पुनर्वहति वै जलम् ।। ९८ ।। रात्रीको जलमें छोड़े तो जल रुके और लोन छोड़े तो फिर बहे ।।९८।। मंत्रः । ॐनमो भगवते रुद्राय ठः ठः ठः ठः ठः ठः । मगरशिवानौगहा एषां गृह्णाति वै शवम् ।। सर्पस्य च फणं तैले पाचयेन्मध्यमाग्निना ।। ९९ ।। यह मंत्र पढ़ मगर शिव और नौगहा इन जीवोंकी लाश लेकर और साँपकी फणा ले तेलमें मध्यम अग्निसे पचावे ।।९९।। स्वशिरसि नासिकायां कर्णयोरपि लेपयेत् ।। तदा गच्छति जले वै यथा गच्छति सर्पराट् ।। १०० ।। और अपने शिरमें नाशिकामे कानमें लगावे तो सांपके सरीखा जलमें चला जाय ।।१००।। दिक्सहस्रं जपेन्मंत्रमुपोष्य च चतुर्दिनम् ।। शिवपूजां ततो कृत्वा सिद्धं यातं च मंत्रकम् ।। १०१ ॥ मंत्रका दश हजार जप करे, चार दिन व्रत करे और शिवकी पूजा करे तो मंत्र सिद्ध होय ।।१०१।। प्रथमं च वशीकर्णं ततः स्तंभनकारकम् ।। मंत्रा उक्ताश्चौषधीश्च सर्वसिद्धिकरीस्तथा ।। १०२ ।। इति श्रीअवस्थीप्रयागदत्तसुतरामचरणविरचिते रुद्रयामलशाबरतंत्रे प्रथमः पटलः ।। १ ।। इस पटलमें प्रथम वशीकरण फिर स्तंभन फिर मंत्र और फिर औषधी कही है ।।१०२।। इति भाषाटीकायां प्रथमः पटलः ।।१।।

२४ रुद्रयामलतन्त्रम् भाषाग्रंथं च दृष्ट्वा हि संस्कृतं कृतवानहम् ॥ नंदरामस्य प्रेरणा चास्माकं प्रचोदयति ॥ १ ॥ भाषाग्रंथ हमने देखा सोही संस्कृत किया, नंदरामका कहना हमको प्रेरित कर रहा है ॥१॥ अथातः संप्रवक्ष्यामि मोहनं च विशेषतः ॥ धत्तूरस्य च पंचांगं चूर्णयेत्सुसमाहितः ॥ २ ॥ महिषीसर्परुधिरे चार्च्यं तं चापि यत्नतः ॥ संध्यायां धूपयेद्देहभवलोकाच्च मोहति ॥ कृष्णवृश्चिकचूर्णं च धूपयेन्मोहनं भवेत् ॥ ३ ॥ अब इसके उपरांत मोहन कहते हैं । धतूरेका पंचांग चूर्ण कर महिषीका रुधिर और सर्पका रुधिर उसमें मिलाकर संध्यामें अपने अंगमें धूप दे तो जो देखे सो मोहित होय ॥२॥३॥ इंदोरंनि चितावारिं समानीय मनःसिलम् ॥ एषां धूपेन च भवेन्मोहनं नात्र संशयः ॥ ४ ॥ इंदोरनि चितावरि और मनःशिल इनका अंगमें धूप दे तो देखेसे मोहन होय इसमें संदेह नहीं है ॥४॥ धत्तूरस्य च बीजानि हरतालं च गृह्य वै ॥ ५ ॥ खादयेच्चैव यं शत्रुं वातरोगी तदा भवेत् ॥ दुग्धशर्करपानेन वातरोगाद्विमुच्यते ॥ ६ ॥ धतूरेके बीज और हरताल जिस शत्रुको खवावे वह वातरोगी होय और दुग्ध शक्कर पिलावे तो वात रोगसे छूटे ॥५॥६॥

हिन्दीटीकासहितम् २५ छछूंदरं कृष्णसर्पशिरं वृश्चिकटंककम् ॥ सायं प्रधूपयेदंगं मोहनं च भवेत्तदा ॥ ७ ॥ छछूंदर कृष्णसर्पकी फणा और विच्छूका टाकु ले संध्यामें अंगको धूपित करे तो मोहन होय ॥७॥ उच्चाटनम् । मंत्रः । ॐ विस्वाय नाम गंधर्वलोचनी नामी लौसतिकरनै तस्मै विश्वाय स्वाहा । मंत्रेदं च जपेच्चैव जले स्थित्वा सहस्रकम् ॥ दशांशं हवनं कार्यं मारणोच्चाटनं भवेत् ॥ ८ ॥ यह मंत्र उच्चाटनका है, इस मंत्रका प्रथम जलमें खड़े होकर १ हजार जप करे और दशांश हवन करे तो मारण और उच्चाटन होय ॥८॥ चितावरस्य काष्ठं च चतुरंगुलमानकम् ॥ पुनर्वसौ च नक्षत्रे गृह्णीयात्सुसमाहितः ॥ ९ ॥ सप्तवारं च मंत्रेण मंत्रयित्वा विधानतः ॥ भूमौ निखनेच्चैव पलायेत्तु न संशयः ॥ १० ॥ चितावरका चार अंगुल काठ पुनर्वसु नक्षत्रमें ले सात वार मंत्र पढ़कर विधानसे भूमिमें गाडे तो शत्रु भागे ॥९॥१०॥ मंत्रः । ॐ लोहितामुख स्वाहा । स्वात्यूक्षे च गृहीत्वा च वेदांगुलप्रमाणकम् ॥ उम्बरीवृक्षस्य काष्ठं यस्य गृहे च खानयेत् ॥ सोपि सद्यो पलायेच्च नात्र कार्या विचारणा ॥ ११ ॥

२६ रुद्रयामलतन्त्रम् यह मंत्र पढ़कर स्वाति नक्षत्रमें उमरीकी लकड़ी ४ अंगुल ले जिसके भमिमें गाड़े वह शत्रु शीघ्र भाग जाय इसमें विचार नहीं ॥११॥ मंत्रः । गिली स्वाहा । भरण्यां च गृहीत्वैव अरुवापाखमुत्तमम् ॥ सप्तवारं च मंत्रेण निचखान गृहे यदा ॥ तदा पलायेद्रिपुश्चनात्र कार्या विचारणा ॥ १२ ॥ भरणी नक्षत्रमें अरुवाकीपाख कीशौनाकी छिपोंका पाख आधा फार ले सातवार मंत्र पढ़कर जिसके गृहमें गाड़ देय वह रिपु भाग जाय इसमें विचार नहीं ॥१२॥ मंत्र । ॐ दहदहवन स्वाहा । अश्वन्यृक्षे गृहीत्वैव वाज्यस्थिचतुरंगुलम् ॥ सप्तवारं च मंत्रेण निखनेच्च रिपोर्गृहे ॥ सोपि यातो गृहाच्छीघ्रं पलायनपरो भवेत् ॥ १३ ॥ अश्विनी नक्षत्रमें बाजीका हाड़ ४ अंगुल ले सात वार मंत्र पढ़कर शत्रुके घरमें गाड़ दे तो शत्रु भाग जाय ॥१३॥ मंत्रः ॐ घुंघूतिठःठः स्वाहा । अरुवावृक्षस्य पाषमष्टोत्तरशतं हुनेत् ॥ यस्य नाम गृहीत्वैव सोपि भग्नो भवेद्ध्रुवम् ॥ १४ ॥ शौनका एक पाश ले एक सो आठ वार मंत्र पढ़ जिसका नाम लेकर हवन करे सो भाग जाय ॥१४॥

हिन्दीटीकासहितम् २७ मंत्रः । ॐ नभो भगवते रुद्राय दंष्ट्राकरां लायकपिरूपाय अमुकपुत्रबांधवैः सह हन हन दह दह चय चय शीघ्रमुच्चाटय फुंफट् स्वाहा ठः ठः। मानुषास्थिसमादाय चतु रंगुलकं शुभम् ॥ यस्यांगणे निचखने- त्सोपि भाग्नो भवेद्गृहात् ॥ १५ ॥ यह मंत्र पढ़कर मनुष्यका हाड़ ४ अंगुल ले जिसके आंगनमें गाड़ देय तो गृहसे भाग जाय ।।१५।। भरण्यृक्षे समादाय स्मशानकाष्ठं त्र्यंगुलम् ॥ षट्सप्ततिवारांश्च जपित्वा मंत्रमेव च ।: यस्य गृहे निचखनेत्तस्य नाशो भवेद्ध्रुवम् ॥ १६ ॥ भरणी नक्षत्रमें मसानकी लकड़ी तीन अंगुल ले छिहत्तर ७६ वार मंत्र जप जिसके गृहमें गाडे उसका नाश होय ।।१६।। मंत्र । ॐ निरिनिहिउठः । ॐ नमो भगवतेरुद्राय अमुकगृहनगृहनपचपचत्रासय त्रोटयनाशयसुरतिराग्यायति ठः ठः। अंगुलैकं मानुषस्य चास्थिकीलं समानयेत् ॥ काकपित्तेन संश्लिष्टं द्वारि खानात्पलायते ॥ १७ ॥ यह मंत्र पढ़ एक अंगुल मनुष्यके हाड़की कील काकके पित्तमें भिजोके जिसके द्वारमें गाड़े सो भाग जाय ।।१७।।

२८ रुद्रयामलतन्त्रम् मंत्रः ॐ ह्रीं दंडीनंहीनमहादंडिनमस्ते ठः ठः। सप्तांगुलं मानुषास्थिकीलं निच खनेद्गृहे ॥ मंत्रेण च यस्य रिपोर्गृहं त्यक्त्वा पलायते ॥ १८ ॥ मंत्र पढ़कर सात अंगुल मनुष्यके हाड़की कील गृहमें गाडे तो शत्रु भाग जाय ॥१८॥ अर्द्धझारस्य कीलं च चतुरंगुलकं तथा ॥ मघायां च जपेन्मंत्रं वशीभूतो न संशयः ॥ १९ ॥ आधेझारेकी चार अंगुलकी लकड़ी मघा नक्षत्रमें ले मंत्र जपकर उसकी कील गाड़े तो वश्य होय ॥१९॥ पुष्यर्क्षे मानुषास्थिचतुरंगुलकीलकम् ॥ नामोच्चारणमात्रेण गृहे च निचखानयेत् ॥ सोपिमृत्युमवाप्नोतिब्रह्मणारक्षितो यदि ॥ २० ॥ पुष्यनक्षत्रमें मनुष्यके हाड़की कील ४ अंगुल लेकर मंत्र पढ़ नाम ले गाड़ दे सो ब्रह्मातक रक्षा करे तोभी मर जाय ॥२०॥ मंत्रः । ॐ शुरशुरे स्वाहा । सर्पास्थिचांगुलं चैकमाश्लेषार्क्षे समानयेत् ॥ निखनेत्सप्तमंत्रेण तदा च मरणं भवेत् ॥ २१ ॥ मंत्र पढ़कर सर्पके हाड़की एक कील ले आश्लेषा नक्षत्रमें ले सात बार मंत्र पढ़ गाड़े तौ मरण होय ॥२१॥ मंत्रः । ॐ शुक्ले स्वाहा । छूळ्दियाकीटमेकं वृश्चिकटंकमेव च ॥ तजं केवाक्षबीजं च चैकत्र सह मर्दयेत् ॥ २२ ॥

हिन्दीटीकासहितम् २९ यह मंत्र पढ़कर छवूदियाकीट, वीछूका टाक, तज और केवाचके बीज ले सब बराबर मर्दन कर ॥२२॥ यस्य वस्त्रे क्षिपेच्चैव बहुगुल्मप्रजायते ॥ मरणं सप्तदिवसे भवेत्तस्य न संशयः ॥ २३ ॥ जिसके कपड़ेपर छोड़ दे सो गुल्मरोगी हो सात दिनमें मर जाय ॥२३॥- चिताकाष्ठस्य धनुषं कच्छपस्य शरंतथा ॥ मृण्मयीं पुत्तलीं कृत्वा शत्रो रूपमयीं तथा ॥ शरेण वेधयेत्तां च मृत्युर्भवति नान्यथा ॥ २४ ॥ चिताकी लकड़ीकी धनु बनावे, कछुवाका तीर बनावे, माटीकी शत्रु- कीसी पुतरी बनावे और उसको तीरसे मारे तो शत्रु मरे यह अन्यथा नहीं है ॥२४॥ रक्तवर्णं शरैकं च स्वजंघास्थिधनुस्तथा ॥ २५ ॥ मयूरशिरस्य केशान्हस्ते कृत्वा विशेषतः ॥ दक्षिणाभिमुखं कृत्वा धनुषं च समरोपयत् ॥ २६ ॥ लाल रंगका एक शर बनावे और कुत्तेकी जंघाका धनुष बनावे, मोरके शिरके बाल हाथमें ले दक्षिणमुख होकर धनुष चढ़ावे ॥२५॥२६॥ सिंदूरसप्तमंडरान्कृत्वा सप्त नाम लिखेत् ॥ स्वशत्रोश्च धनुष्बाणं बाणेन व्यधमेच्चतम् ॥ २७ ॥ सिंदूरके सात लीके बनाके उसमें अपने शत्रु का नाम लिखे और शत्रु का धनुष बाण बनाके उसके अपने बाणसे मारे ॥२७॥ मंत्रः । ॐ हाथ खङ्गमूशल लै कमला गरुड़ पाय परति आवै ताहि मारि हो नर-

३० रुद्रयामलतन्त्रम् सिंह वीर वायु नरसिंहवीर प्रचंडकी शक्ति लें लें लें लें त्रिशूला उत् मूला गर्जि झाइ छडाउ ताहि छाडि । मंत्रः । ॐ नमो नर- सिंहाय कपिलजटाय अमोघवीचासत्तवृ- त्ताय महाडोग्रचंडरूपाय ॐ र्ह्रीं र्ह्रीं छां छां छीं छीं फट् स्वाहा ॥ जपेद्दशसहस्त्रं तु हवनं तद्दशांशतः ॥ रक्तपुष्पैः कोविदारैरा- ज्येन च समन्वितैः ॥ २८ ॥ इन मंत्रोंका दश हजार जप और दशांश लाल कदपल और घृत फूल मिलाकर होम करे ॥२८॥ काकपक्षं तथा पादं कुशं चांजलिनाग्रहीत् ॥ चैकविशत्यंजलि च दद्यान्नद्यां निरंतरम् ॥ २९ ॥ कौवेका पंख तथा पंजा और कुश हाथमें लेकर इक्कीस अंगली नदीमें निरंतर तर्पण करे ॥२९॥ नित्यं गत्वा जपेन्मंत्रमष्टोत्तरशतं तथा ॥ अर्कपुष्पान्करे कृत्वा भ्रमचित्तो भविष्यति ॥ ३० ॥ मंत्रः । ॐ नमोटकिप्रमोटगोरोअमुकस्यामु- कस्य अरुव कुरु कुरु स्वाहा ॥ एक सौ आठ वार मंत्र जपे, अकउडके फूल हाथमें लेकर मंत्र जपे तो शत्रु भ्रमचित्त हो जाय ॥३०॥

हिन्दीटीकासहितम् ३१ व्याधिकरणम् । भल्लातकं च गुंजा च अर्नि समभागकान् ॥ यस्योपरि क्षिपेच्चैव सोपि कुष्ठीभवेत्तदा ॥ शर्करादुग्धपानेन मुक्तरोगोऽभिजायते ॥ ३१ ॥ भिलावा गुंजा अरनी ये बराबर ले जिसके ऊपर छोडे सो कुष्ठी होय और शर्करा दुग्ध पीवे तो रोगसे छूटे ॥३१॥ केंवाचबीजं कृष्णं च शतावरीं समानयेत् ॥ ३२ ॥ गुंजां समानभागां च चैकत्र सहमर्दयेत् ॥ यस्यांगे च क्षिपेच्चैव पामारोगो भवेत्तदा ॥ ३३ ॥ कृष्ण केवाछबीज और शतावरि और इनके बराबर गुंजा ले एकत्र करके मर्दन कर जिसके अंगमें लगा दे उसके अंगमें खुजली पडे ॥३२॥३३॥ माषे चन्दनपूगौ च रक्तचंदनवारिणा ॥ तस्य लेपनमात्रेण पामारोगो विनश्यति ॥ ३४ ॥ उर्द चंदन और सुपारी रक्तचंदनके जलमें मिलाकर लगा दे तो नीका होय ॥ ३४ ॥ मंत्रः । ॐ नमो भगवते रुद्राय उंडासारेसु- राय अमुकरोगे न ग्रह न ग्रह नपत्रप च ताडय ताडय किलेदंह फट ठः ठः ॥ शतावरीसमुत्खारं कोविदारस्य मूलकम् ॥ एकत्र कृत्वा मर्दयेद्भोजनाद्याति दास्यताम् ॥ ३५ ॥ शतावरि, समुद्रखार और कदपलको एकत्र मर्दन कर खिलावे तो दास होय ॥३५॥

३२ रुद्रयामलतन्त्रम् अरुवा मस्तके धृत्वा लवणं सप्ताहानि च ॥ ताम्रपात्रे न्यसेच्चैव बिभीतकक्वाथमुत्तमम् ॥ तेनैव चांजयेन्नेत्रं दृष्टिर्न स्फुरते तदा ॥ ३६ ॥ अरुवा माथेपर घरे और लवण सात दिन मस्तक पर घरे और बहेरेका क्वाफ तामेके पात्रमें घरे और तिससे नेत्रमें अंजन करे तो दृष्टि प्रकाशित न होय ॥३६॥ निर्लज्जकरणम् । हरतालं च धत्तूरं बीजं काष्ठघुणं तथा ॥ भोजनं कारयेद्यं वै स निर्लज्जो भविष्यति ॥ शर्करादुग्धपानेन पूर्ववत्स भविष्यति ॥ ३७ ॥ हरताल और धतूरेके बीज और काठका घुन जिसको खिलावे सो निर्लज्ज होय और शक्कर दूध पिलावे तो फिर पहिलेकी तरह होय ॥३७॥ हरतालं लशुनं च कनकस्य च बीजकम् ॥ चूर्णयित्वा च तान्सर्वान्यस्य शिरसि निक्षिपेत् ॥ ३८ ॥ सोपि चकितो भवेच्च नात्रकार्या विचारणा ॥ दुग्धशर्करपानेन पुनर्मुक्त्तो भविष्यति ॥ ३९ ॥ हरताल लशुन और धतूरेके बीज चूर्ण कर जिसके शिरपर छोड़े सो चकित होय इसमें संदेह नहीं और दूध शक्कर पीनेसे फिर अच्छा होय ॥३८॥ ३९॥ कृष्णतिलं घृतं चैव मत्स्यपित्तं तथैव च ॥ ४० ॥ खादयेद्यं सुधीश्र्चैव निर्लज्जो भवति क्षणात् ॥ सैंधवं लवणाज्यं च ह्यजादुग्धेन वै पिबेत् ॥ ४१ ॥

हिन्दीटीकासहितम् ३३ कृष्ण तिल घृत मच्छरीका पित्त जिसको खिलावे सो सुंदर बुद्धिवाला भी होय और सेंधा लोन घृत छेरीके दूधमें मिलाकर पिलावे तो शुद्ध होय ॥४०॥४१॥ मयूरपरेवयोर्विट्कुक्कुटस्य तथैव च ॥ यस्य मूर्ध्नि क्षिपेच्चैव स पिशाचो भविष्यति ॥ मुंडनाच्चैव शुद्धोऽभून्नात्र कार्या विचारणा ॥ ४२ ॥ मयूर और परेवाकी विष्ठा और मुरगेकी विष्ठा जिसके मूंडपर छोड़े सो पिशाच होय और मुंड मुंडायेसे अच्छा होय ॥४२॥ गुडकांज्यस्य बीजं च काष्ठकीटं तथैव च ॥ ४३ ॥ समभागं वटीं कृत्वा भोजनं कारयेन्नरः ॥ निर्लज्जो भवेच्चैव ह्यंजनेन सलज्जताम् ॥ ४४ ॥ गुडकांजके बीज और काठका धुन इनकी बराबर वटी करे और खिलावे तो निर्लज्ज होय और अंजन लगायेसे शुद्ध (लाजवाला) होय ॥४३॥४४॥ अश्वास्थिकीलमानीय सप्तांगुलप्रमाणकम् ॥ निखनेदश्वशालायां तदाश्वा यांति संक्षयम् ॥ ४५ ॥ घोडेके हाड़की सात अंगुलकी कील लेकर घोडसारमें गाडे तो घोडे यमपुरको जाँय ॥ ४५ ॥ मंत्रः । ॐ पच पच स्वाहा । सप्तवारं पठेन्मंत्रं ततो कीलं समानयेत् ॥ चितावरस्य काष्ठस्य सप्तांगुलप्रमाणकम् ॥ ४६ ॥ यह मंत्र सात वार पढे और चितावरकीलकडीकी सात अंगुलकी कील ॥ ४६ ॥

३४ रुद्रयामलतन्त्रम् सप्तवारं पठेन्मंत्रं ततः कीलं निवेशयेत् ।। निखनेदश्वशालायामश्वा यांति यमालयम् ।। ४७ ।। सात वार मंत्र पढे और घोड़सारमें गाडे तो घोडे मरें ।। ४७ ।। मंत्रः । ॐ लोहितामुख स्वाहा । पुनर्वस्वृक्षेगृहणीयाच्चितावरस्य काष्ठकम् ।। अष्टांगुलौ च द्वौ कीलौ निखनेतां च क्षेत्रको ।। क्षेत्रहानिर्भवत्येव सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ।। ४८ ।। यह मंत्र पढकर पुनर्वसु नक्षत्रमें चितावरकीदो कीलें आठ आठ अंगुलकी खेतमें गाडे तो खेत नष्ट होय यह मैं सत्य २ कहता हूँ ।। ४८ ।। मंत्रः । ॐ लोहितामुखे स्वाहा । पूर्वाषाढे च काष्ठस्य सप्तांगुलं च कीलकम् ।। रजकगृहे निखनेत् न याति वस्त्रमुज्ज्वलम् ।। ४९ ।। मूलस्थ मंत्र पढ पूर्वाषाढानक्षत्रमें काठकी कील सात अंगुलकी धोबीके घरमें गाड़े तो वस्त्र उजले न होंय ।। ४९ ।। मंत्रः ॐ कुंभस्वाहा । उत्तराफाल्गुन्यृक्षे च बदरी काष्ठकीलकम् ।। अष्टांगुलंसमादाय सप्तवारेण मंत्रितम् ।। रजकगृहे निखनेद्वस्त्रं भवति नोज्ज्वलम् ।। ५० ।। मूलमें मंत्र है उसे पढकर उत्तराफाल्गुनीमें बेरी की लकड़ीकी कील आठ अंगुलकी सात बार मंत्र पढकर धोबीके घरमें गाडे तो वस्त्र उज्ज्वल न होय ।। ५० ।।

हिन्दीटीकासहितम् मंत्र । ॐ जले स्वाहा । हस्तर्क्षे कोविदारस्य त्र्यंगुलं कीलमुद्धरेत् ॥ कुलालभांडेनि- खनेत् भाडं नृयाति पक्वताम् ॥ भोजनस्य च पात्राणि यांति भग्नानि सर्वतः ॥ ५१ ॥ मूलमें लिखा हुआ मंत्रपढकरहस्तनक्षत्रमें कदपलकी लकड़ी तीन अंगुलकी कुम्हारके आवेमें गाडे तो बर्त्तन न पकें और रसोईके पात्रसबफूट जाँय ॥ ५१ । गोक्षुरं च ह्यजाशृंगं तालबुखारं तथैव च ॥ ५२ ॥ शूकरस्य च विट्‌चैव श्वेतगुंजकमूलकम् ॥ पाकग्रहे निक्षिपेच्च भग्नभांडानि जायते ॥ ५३ ॥ गोखुरू छेरीके शृंग तालबुखारा और शूकरविष्ठा और सफेद गुंजाकी जड रसोईके मकानमें छोड देय तो बर्तन फूट जाँय ॥ ५२ ॥ ५३ ॥ स्निग्धभांडेषु मंत्रेण मंत्रितेषु शुभेषु च ॥ तदा भांडानि सर्वाणि भग्नं यांति न संशयः ॥ ५४ ॥ चिकने बर्तनोंमें मंत्र पढे तो सब बर्तन फूट जाँय इसमें संशय नहीं है ॥५४॥ मंत्रः ॐ मदमदस्वाहा । चित्रर्क्षे मधूकवृक्षस्य चतुरंगुलकीलकम् ॥ तैलयंत्रसमीपे तु निखनात्तैलबंधनम् ॥ ५५ ॥ मूलका लिखा मंत्र पढ चित्रानक्षत्रमें महुएकी कील चार अंगुलकी तेलीके कोल्हूके नीचे गाडे तो तेल न बहे ॥ ५५ ॥ मंत्रः । ॐ दहदहस्वाहा । रजकश्लिष्टवस्त्रस्य मृदमानीय यत्नतः ॥ तेन त्रिकोणप्रतिमां कारयेदंगणेऽथवा ॥ ५६ ॥