रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)
Rudrayamala Tantra (Uttara Tantra) with Hindi Commentary
भगवान भैरव / पं. रामचरण शर्मा द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दीटीकासहितम् मंत्र । ॐ जले स्वाहा । हस्तर्क्षे कोविदारस्य त्र्यंगुलं कीलमुद्धरेत् ॥ कुलालभांडेनि- खनेत् भाडं नृयाति पक्वताम् ॥ भोजनस्य च पात्राणि यांति भग्नानि सर्वतः ॥ ५१ ॥ मूलमें लिखा हुआ मंत्रपढकरहस्तनक्षत्रमें कदपलकी लकड़ी तीन अंगुलकी कुम्हारके आवेमें गाडे तो बर्त्तन न पकें और रसोईके पात्रसबफूट जाँय ॥ ५१ । गोक्षुरं च ह्यजाशृंगं तालबुखारं तथैव च ॥ ५२ ॥ शूकरस्य च विट्चैव श्वेतगुंजकमूलकम् ॥ पाकग्रहे निक्षिपेच्च भग्नभांडानि जायते ॥ ५३ ॥ गोखुरू छेरीके शृंग तालबुखारा और शूकरविष्ठा और सफेद गुंजाकी जड रसोईके मकानमें छोड देय तो बर्तन फूट जाँय ॥ ५२ ॥ ५३ ॥ स्निग्धभांडेषु मंत्रेण मंत्रितेषु शुभेषु च ॥ तदा भांडानि सर्वाणि भग्नं यांति न संशयः ॥ ५४ ॥ चिकने बर्तनोंमें मंत्र पढे तो सब बर्तन फूट जाँय इसमें संशय नहीं है ॥५४॥ मंत्रः ॐ मदमदस्वाहा । चित्रर्क्षे मधूकवृक्षस्य चतुरंगुलकीलकम् ॥ तैलयंत्रसमीपे तु निखनात्तैलबंधनम् ॥ ५५ ॥ मूलका लिखा मंत्र पढ चित्रानक्षत्रमें महुएकी कील चार अंगुलकी तेलीके कोल्हूके नीचे गाडे तो तेल न बहे ॥ ५५ ॥ मंत्रः । ॐ दहदहस्वाहा । रजकश्लिष्टवस्त्रस्य मृदमानीय यत्नतः ॥ तेन त्रिकोणप्रतिमां कारयेदंगणेऽथवा ॥ ५६ ॥