रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)
Rudrayamala Tantra (Uttara Tantra) with Hindi Commentary
भगवान भैरव / पं. रामचरण शर्मा द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 36, कुल 68 में से
संदर्भ में पढ़ें३४ रुद्रयामलतन्त्रम् सप्तवारं पठेन्मंत्रं ततः कीलं निवेशयेत् ।। निखनेदश्वशालायामश्वा यांति यमालयम् ।। ४७ ।। सात वार मंत्र पढे और घोड़सारमें गाडे तो घोडे मरें ।। ४७ ।। मंत्रः । ॐ लोहितामुख स्वाहा । पुनर्वस्वृक्षेगृहणीयाच्चितावरस्य काष्ठकम् ।। अष्टांगुलौ च द्वौ कीलौ निखनेतां च क्षेत्रको ।। क्षेत्रहानिर्भवत्येव सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ।। ४८ ।। यह मंत्र पढकर पुनर्वसु नक्षत्रमें चितावरकीदो कीलें आठ आठ अंगुलकी खेतमें गाडे तो खेत नष्ट होय यह मैं सत्य २ कहता हूँ ।। ४८ ।। मंत्रः । ॐ लोहितामुखे स्वाहा । पूर्वाषाढे च काष्ठस्य सप्तांगुलं च कीलकम् ।। रजकगृहे निखनेत् न याति वस्त्रमुज्ज्वलम् ।। ४९ ।। मूलस्थ मंत्र पढ पूर्वाषाढानक्षत्रमें काठकी कील सात अंगुलकी धोबीके घरमें गाड़े तो वस्त्र उजले न होंय ।। ४९ ।। मंत्रः ॐ कुंभस्वाहा । उत्तराफाल्गुन्यृक्षे च बदरी काष्ठकीलकम् ।। अष्टांगुलंसमादाय सप्तवारेण मंत्रितम् ।। रजकगृहे निखनेद्वस्त्रं भवति नोज्ज्वलम् ।। ५० ।। मूलमें मंत्र है उसे पढकर उत्तराफाल्गुनीमें बेरी की लकड़ीकी कील आठ अंगुलकी सात बार मंत्र पढकर धोबीके घरमें गाडे तो वस्त्र उज्ज्वल न होय ।। ५० ।।