रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)
Rudrayamala Tantra (Uttara Tantra) with Hindi Commentary
भगवान भैरव / पं. रामचरण शर्मा द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दीटीकासहितम् ३३ कृष्ण तिल घृत मच्छरीका पित्त जिसको खिलावे सो सुंदर बुद्धिवाला भी होय और सेंधा लोन घृत छेरीके दूधमें मिलाकर पिलावे तो शुद्ध होय ॥४०॥४१॥ मयूरपरेवयोर्विट्कुक्कुटस्य तथैव च ॥ यस्य मूर्ध्नि क्षिपेच्चैव स पिशाचो भविष्यति ॥ मुंडनाच्चैव शुद्धोऽभून्नात्र कार्या विचारणा ॥ ४२ ॥ मयूर और परेवाकी विष्ठा और मुरगेकी विष्ठा जिसके मूंडपर छोड़े सो पिशाच होय और मुंड मुंडायेसे अच्छा होय ॥४२॥ गुडकांज्यस्य बीजं च काष्ठकीटं तथैव च ॥ ४३ ॥ समभागं वटीं कृत्वा भोजनं कारयेन्नरः ॥ निर्लज्जो भवेच्चैव ह्यंजनेन सलज्जताम् ॥ ४४ ॥ गुडकांजके बीज और काठका धुन इनकी बराबर वटी करे और खिलावे तो निर्लज्ज होय और अंजन लगायेसे शुद्ध (लाजवाला) होय ॥४३॥४४॥ अश्वास्थिकीलमानीय सप्तांगुलप्रमाणकम् ॥ निखनेदश्वशालायां तदाश्वा यांति संक्षयम् ॥ ४५ ॥ घोडेके हाड़की सात अंगुलकी कील लेकर घोडसारमें गाडे तो घोडे यमपुरको जाँय ॥ ४५ ॥ मंत्रः । ॐ पच पच स्वाहा । सप्तवारं पठेन्मंत्रं ततो कीलं समानयेत् ॥ चितावरस्य काष्ठस्य सप्तांगुलप्रमाणकम् ॥ ४६ ॥ यह मंत्र सात वार पढे और चितावरकीलकडीकी सात अंगुलकी कील ॥ ४६ ॥