भारतकोश
रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)

रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)

Rudrayamala Tantra (Uttara Tantra) with Hindi Commentary

भगवान भैरव / पं. रामचरण शर्मा द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished68 पृष्ठ

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३२ रुद्रयामलतन्त्रम् अरुवा मस्तके धृत्वा लवणं सप्ताहानि च ॥ ताम्रपात्रे न्यसेच्चैव बिभीतकक्वाथमुत्तमम् ॥ तेनैव चांजयेन्नेत्रं दृष्टिर्न स्फुरते तदा ॥ ३६ ॥ अरुवा माथेपर घरे और लवण सात दिन मस्तक पर घरे और बहेरेका क्वाफ तामेके पात्रमें घरे और तिससे नेत्रमें अंजन करे तो दृष्टि प्रकाशित न होय ॥३६॥ निर्लज्जकरणम् । हरतालं च धत्तूरं बीजं काष्ठघुणं तथा ॥ भोजनं कारयेद्यं वै स निर्लज्जो भविष्यति ॥ शर्करादुग्धपानेन पूर्ववत्स भविष्यति ॥ ३७ ॥ हरताल और धतूरेके बीज और काठका घुन जिसको खिलावे सो निर्लज्ज होय और शक्कर दूध पिलावे तो फिर पहिलेकी तरह होय ॥३७॥ हरतालं लशुनं च कनकस्य च बीजकम् ॥ चूर्णयित्वा च तान्सर्वान्यस्य शिरसि निक्षिपेत् ॥ ३८ ॥ सोपि चकितो भवेच्च नात्रकार्या विचारणा ॥ दुग्धशर्करपानेन पुनर्मुक्त्तो भविष्यति ॥ ३९ ॥ हरताल लशुन और धतूरेके बीज चूर्ण कर जिसके शिरपर छोड़े सो चकित होय इसमें संदेह नहीं और दूध शक्कर पीनेसे फिर अच्छा होय ॥३८॥ ३९॥ कृष्णतिलं घृतं चैव मत्स्यपित्तं तथैव च ॥ ४० ॥ खादयेद्यं सुधीश्र्चैव निर्लज्जो भवति क्षणात् ॥ सैंधवं लवणाज्यं च ह्यजादुग्धेन वै पिबेत् ॥ ४१ ॥